चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१३ क्रव्यादस्वरसः शस्तो भोजनार्थे सदीपनः । तक्रारनालमद्यानि पानार्थेऽरिष्ट एव च ॥ ११७ ॥ ( २३ ) भोजन के लिये जांगल पशु पक्षियो का मास रस अथवा मास खाने वाले पशुओ के मास-रस को पञ्चकोल ( पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चीता और सोठ ), मूली और मरिच इनसे सस्कृत करके घी आदि से स्निग्ध करके तथा अनार और दही से खट्टा करके देना चाहिये । यह रस अग्नि-दीपक होता है । मुद्ग यूष को भी पञ्चकोल आदि से संस्कृत करके और घी से भून कर अनार आदि से खट्टा करके देना चाहिये । पीने के लिये छाछ, काजी, मद्य और अरिष्ट देने चाहिये ॥ ११६-११७ ॥ तक्रं तु ग्रहणीदोषे दीपनग्राहिलाघवात् । श्रेष्ठं मधुरपाकित्वान्न च पित्तं प्रकोपयेत् ॥ ११८ ॥ कषायोष्णविका सित्वाद्रौक्ष्याच्चैव कफे मतम् । वाते स्वाद्वम्लसान्द्रत्वात् सद्यस्कमविदाहि तत् ॥ ११९ ॥ तस्मात् तक्रप्रयोगा ये जठराणां तथाऽर्शसाम् । विहिता ग्रहणी दोषे सर्वशस्तान् प्रयोजयेत् ॥ १२० ॥ ( २४ ) तक्र-प्रयोग—तक्र के दीपन ( अग्निदीपक ), संग्राही और लघु होने से यह तक्र ग्रहणी रोग मे हितकारी है । तक्र का विपाक मधुर है, इसलिये यह पित्त को प्रकुपित नहीं करता । कषायरस उष्णवीर्य और विकासी ( सब सूक्ष्म स्रोतों मे प्रविष्ट होने की प्रवृत्ति वाला ) और रूक्ष होने से कफजन्य ग्रहणी मे हितकारी है । तुरन्त मथा हुआ तक्र स्वादु ( मधुर ) पाक, अम्ल रस और सान्द्र ( स्नेहयुक्त ) होने से वातजन्य ग्रहणी मे हितकारी है । तुरन्त मथा हुआ तक्र विदाह उत्पन्न नही करता । इसलिये उदर रोगियो और अर्श रोगियों के लिये जो तक्र के प्रयोग कहे है वे सब ग्रहणी रोग मे प्रयोग करने चाहिये ॥ ११८-१२०॥ यवान्यामलके पथ्या मरिचं त्रिपलांशिकम् । लवणानि पलांशानि पञ्च चैकत्र चूर्णयेत् ॥ १२१ ॥ तक्रकं सासुतं जातं तक्रारिष्टं पिबेन्नरः । दीपनं शोथगुल्मार्शःकृमिमेहोदरापहम् ॥ १२२ ॥ इति तक्रारिष्टः । ( २५ ) तक्रारिष्ट—अजवायन, आंवला, हरड़, मरिच ये सब मिलित तिहाई पल और मिलित पाचों नमक ( सैन्धा, सामुद्र, बिड्, संचल और उद्- भिद ) चौथाई पल मिला कर सबका चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको तक्र के