चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१४ चरकसंहिता [ अ० १५ साथ पीना चाहिये और जिस समय तक्रारिष्ट मे अम्लता उत्पन्न हो जाये तब उसको पीना चाहिये । यह अरिष्ट अग्निदीपक, शोथ, गुल्म, अर्श, कृमिरोग, प्रमेह और उदर-रोग को नष्ट करता है ॥ १२१-१२२ ॥ स्वस्थानगतमुत्क्लिष्टमग्निनिर्वापकं भिषक् । पित्तं ज्ञात्वा विरेकेण निर्हरेद्वमनेन वा ॥ १२३ ॥ अविदाहिभिरन्नैश्च लघुभिस्तिक्तसंयुतैः । जाङ्गलानां रसैर्यूपैर्मुद्गादीना खडेरपि ॥ १२४ ॥ दाडिमाम्लैः ससर्पिष्कैर्दीपनग्राहिसंयुतैः । तस्याग्निं दीपयेच्चूर्णैः सर्पिर्भिर्वा सतिक्तकैः ॥ १२५ ॥ (२६) जिस समय कुपित पित्त अपने स्थान पर पहुँच जाय और अग्नि को कम करता हो उस समय इसको वमन या विरेचन द्वारा बाहर करना चाहिये । अग्नि को बढाने के लिये विदाह न करने वाले, लघु अन्नों को तिक्त पदार्थों से मिला कर देना चाहिये । जांगल पशु पक्षियो के मास-रस को, मूग आदि के यूष को, खडों को अनार आदि से खट्टा करके दीपनीय और ग्राही वस्तुओं (तक्र आदि या कैथ, विल्वगिरी आदि) के साथ घी मिला कर देना चाहिये । अथवा कुष्ठ रोग मे कहा तिक्त घृत या तिक्त वस्तुओ से साधित घृत देना चाहिये ॥ १२३-१२५ ॥ चन्दनं पद्मकमुशीरं पाठां मूर्वा कुटन्नटम् । षड्ग्रन्थासारिवास्फोतासप्तपर्णाटरूषकम् ॥ १२६ ॥ पटोलोदुम्बराश्वत्थवटप्लक्षंकपीतमान् । कटुका रोहिणी मुस्त निम्ब च द्विपलांशिकम् ॥ १२७ ॥ द्रोणेऽपा साधयेत् पादशेषे प्रस्थ घृतात्पचेत् । किराततिक्तेन्द्रयववीरामागधिकोत्पलैः ॥ १२८ ॥ कल्कैरक्षसमैः पेयं तत् पित्तग्रहणीगदे । तिक्तकं यद् घृत चोक्तं कौष्ठिके तच्च दापयेत् ॥ १२९ ॥ इति चन्दनाद्यं घृतम् । (२७) चन्दनाद्य घृत—चन्दन, पद्माख, खस, पाठा, मूवा, कुटन्नट (कैवर्त्तमुस्ता ), वच, शारिवा, आस्फोता (सारिवा या कपूर माधुरी ), सतवन आटरूषक (वासा ), पटोल, गूलर, पीपल, बड़, पिलखन, कपीतन (पारस पीपल ), कुटकी, माथा और नीम प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे इनका क्वाथ करना चाहिये और जब चतुर्थांश शेष रह जाये तब इसको छान