चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 599, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१५ लेना चाहिये । इसमे घृत १ प्रस्थ और कल्कार्थ—चिरायता, इन्द्रजौ, वीरा (शालपर्णी या शतावरी), मागधिका (पिप्पली) और कमलगट्टा प्रत्येक एक- एक अक्ष लेकर इनका कल्क करना चाहिये । इन सबो को मिला कर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत पित्तजन्य ग्रहणी रोग मे हितकारी है । कुष्ठ रोग मे जो तिक्त घृत [दो] कहे हैं उनका भी प्रयोग करना चाहिये ॥ १२६-१२६ ॥ नागरातिविषे मुस्तं धातकीं सरसाञ्जनम् । वत्सकत्वक्फलं बिल्वं पाठां कटुकरोहिणीम् ॥ १३० ॥ पिवेत् समाशं तच्चूर्णं सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना । पैत्तिके ग्रहणीदोषे रक्तं यच्चोपवेश्यते ॥ १३१ ॥ अर्शांसि च गुदे शूलं जयेच्चैव प्रवाहिकाम् । नागराद्यमिदं चूर्णं कृष्णात्रेयेण पूजितम् ॥ १३२ ॥ इति नागराद्यं चूर्णम् । (२८) नागराद्य चूर्ण—सोंठ, अतीस, मोथा, धाय के फूल, रसाञ्जन (रसौत), कूड़े की छाल और बेलगिरी, पाठा, कुटकी इन सब का समान भाग, लेकर चूर्ण कर लेना चाहिय । इस चूर्ण को शहद मे मिला कर चावलो के धोवन के साथ पीना चाहिये । इससे पित्तजन्य ग्रहणी रोग में तथा जब मल मे रक्त आता है तब आराम होता है । अर्श, गुदा मे शूल और प्रवाहिका भी इससे नष्ट होते है । यह नागराद्यचूर्ण कृष्णात्रेय से प्रशंसित है इसलिये यह सिद्ध योग है ॥ १३०-१३२ ॥ भूनिम्बं कटुकं व्योषं मुस्तमिन्द्रयवान् समान् । द्वौ चित्रकाद्वत्सकत्वग्भागान् षोडश चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥ गुडशीताम्बुना पीतं ग्रहणीदोषगुल्मनुत् । कामलाज्वरपाण्डुत्वमेहारुच्यतिसारनुत् ॥ १३४ ॥ इति भूनिम्बाद्यं चूर्णम् । (२६) भूनिम्बादि चूर्ण—भूनिम्ब (चिरायता), कटुक (कडु), सोंठ, मरिच, पिप्पली, मोथा, इन्द्रजौ प्रत्येक वस्तु समान भाग, चित्रक दो भाग और कूड़े की छाल १६ भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ठण्डे पानी मे बने गुड़ के शर्बत के साथ पीना चाहिये । गुड़ इतना डालना चाहिये जिससे शर्बत मीठा हो जाये । इससे ग्रहणी रोग, गुल्म, कामला, ज्वर, पाण्डु प्रमेह, अरुचि और अतिसार नष्ट होता है ॥ १३३-१३४ ॥ वचामतिविषां पाठा सप्तपर्णं रसाञ्जनम् ।