चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१७ मद्य या जल के साथ पीना चाहिये। यह चूर्ण हृदयरोग, पाण्डु, ग्रहणीरोग, गुल्म, शूल, अरुचि, ज्वर, कामला, सन्निपात ज्वर तथा मुखरोगो को नष्ट करता है ॥ १३८-१४१ ॥ ग्रहण्यां श्लेष्मदुष्टायां वमितस्य यथाविधि । कट्वम्ललवणक्षारैस्तिक्तैश्चाग्निं विवर्धयेत् ॥ १४२ ॥ (३०) कफजन्य ग्रहणीरोग मे रोगी को प्रथम यथाविधि वमन कराना चाहिये । फिर कटु, अम्ल, लवण, क्षारों से तथा तिक्त वस्तुओ से अग्नि को बढाना चाहिये ॥ १४२ ॥ पलाशं चित्रकं चव्यं मातुलुङ्गं हरीतकीम् । पिप्पली पिप्पलीमूलं पाठा नागरधान्यकम् ॥ १४३ ॥ कार्षिकान्युदकप्रस्थे पक्त्वा पादावशेषितम् । पानीयार्थं प्रयुञ्जीत यवागूं तैश्च साधिताम् ॥ १४४ ॥ (३१) ढाक, चीता, चविका, मातुलुंग (विजोरा), हरड़, पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, सोठ और धनिया प्रत्येक वस्तु एक एक कर्ष लेकर एक प्रस्थ पानी मे पकाना चाहिये । जब चतुर्थांश शेष रह जाये तब इनको छान लेना चाहिये । यही पानी पीने के लिये देना चाहिये । ढाक आदि वस्तुओं से साधित यवागू खाने के लिये देनी चाहिये ॥ १४३-१४४ ॥ शुष्कमूलकयूषेण कौलत्थेनाथवा पुनः । कट्वम्लक्षारपदुना लघ्वन्यन्नानि भोजयेत् ॥ १४५ ॥ अम्लं चानुपिबेत्तक्रं तक्रारिष्टमथापि वा । (३२) सूखी हुई मूली के यूष के साथ अथवा कुलत्थी के यूष के साथ या कटु, अम्ल, क्षार और नमक के साथ लघु-भाजन खिलाना चाहिये । पीछे से खट्टी छाछ या तक्रारिष्ट पीना चाहिये । अग्नि की वृद्धि के लिये अम्ल-तक्र ही उत्तम है ॥ १४५- ॥ मदिरा मध्वरिष्टं वा निगदं शीधुमेव वा ॥ १४६ ॥ द्रोणं मधूकपुष्पाणां विडङ्गाना ततोऽर्धतः । चित्रकस्य ततोऽर्धं स्यात्तथा भल्लातकाढकम् ॥ १४७ ॥ मञ्जिष्ठात्रिपलं चैव त्रिद्रोणेऽपां विपाचयेत् । द्रोणशेषे तु तच्छीतं मध्वर्धाढकसंयुतम् ॥ १४८ ॥ एलामृणालागुरुभिश्चन्दनेन च रूषिते । कुम्भे मासस्थितं जातमासवं तं प्रयोजयेत् ॥ १४६ ॥