चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१८ चरकसंहिता [ अ० १५ ग्रहणीं दीपयत्येष बृंहणः कफपित्तजित्। शोथं कुष्ठं किलासं च प्रमेहाश्च प्रणाशयेत् ॥ १५०॥ इति मध्वासवः। ( ३३ ) मध्वासव—मदिरा अथवा मधु अरिष्ट या निर्दोष सीधु एक द्रोण, महुए के फूल और बायबिडङ्ग प्रत्येक आधा द्रोण, चीता चौथाई द्रोण, भिलावा १ आढक, मजीठ तीन पल इन सबको तीन द्रोण पानी मे पकाना चाहिये। जब एक द्रोण पानी रह जाये तब इसको छान लेना चाहिये। इसके ठण्डा होने पर इसमे शहद आधा आढक मिला देना चाहिये। फिर इलायची, कमलनाथ, अगरु और चन्दन से लिप्त घड़े मे इसको भर कर एक मास तक रख देना चाहिये। जिस समय यह बन जाये तब इसको पीना चाहिये। यह आसव ग्रहणी ( अग्नि ) का बढाता हे, पुष्टि देता है, कफ, पित्त का शमन करता है। शोथ, कुष्ठ, किलास और प्रमेहरोग को नष्ट करता है॥१४६-१५०॥ मधूकपुष्पस्वरसं शृतमर्धक्षयीकृतम्। क्षौद्रपादयुतं शीतं पूर्ववत् सन्निधापयेत् ॥ १५१॥ तं पिबन् ग्रहणीदोषान् जयेत्सर्वान् हिताशनः। तद्वद् द्राक्षेक्षुखर्जूरस्वरसानासुतान् पिबेत् ॥ १५२॥ इति मधूकासवः। ( ३४ ) मधूकासव—महुए के फूलो का स्वरस निकाल कर इसका श्रुत- कषाय करना चाहिये। जब आधा शेष रह जाये इसमे चतुर्थांश शहद मिलाकर पूर्व की भाति घड़े में रख देना चाहिये। इसके पीने से सब ग्रहणी-रोग नष्ट हो जाते है। इसको पीते समय रोगी को पथ्य का सेवन करना चाहिये। इसी प्रकार से द्राक्षा, खजूर के स्वरसो से भी आसव तैय्यार करके पीने चाहिये॥१५१-१५२॥ प्रस्थौ दुरालभाया द्वौ प्रस्थमामलकस्य च। मुष्टी चित्रकदन्त्योर्द्वे प्रत्यग्रं चाभयाशतम् ॥ १५३॥ चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा शीतं द्रोणावशेषितम्। सगुडद्विशतं पूतं मधुनः कुडवायुतम् ॥ १५४॥ तद्वत् प्रियङ्गोः पिप्पल्या विडङ्गाना च चूर्णितैः। कुडवैर्घृतकुम्भस्थं पक्षाज्जातं ततः पिबेत्॥ १५५॥ ग्रहणीपाण्डुरोगार्शःकुष्ठवीसर्पमेहनुत्। स्वरवर्णकरश्चैष रक्तपित्तकफापहः ॥ १५६ ॥ इति दुरालभासवः।