भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१६

( ३५ ) दुरालभासव—दुरालभा ( धमासा ) दो प्रस्थ, आवला १ प्रस्थ,
चीता और दन्ती दो पल, नई ( हरी ) हरड़ें १००, इनको चार द्रोण पानी मे
पकाना चाहिये। जब एक द्रोण शेष रह जाये तो छान लेना चाहिये । ठण्डा
होने पर इसमे गुड़ २०० पल और मधु १ कुड़व मिलाना चाहिये । प्रियंगु,
पिप्पली और विडग इनका मिलित चूर्ण ३ कुड़व मिलाना चाहिये। इन सब
को घृत से भावित घड़े मे पन्द्रह दिन तक रख देना चाहिये । जब यह
तैय्यार हो जाये तब इसको पीना चाहिये । इसके पीने मे ग्रहणी रोग, पाण्डु
राग, अर्श, कुष्ठ, वीसर्प और प्रमेह रोग नष्ट होते है, स्वर और कान्ति बढ़ती
है, रक्त, पित्त और कफ का नाश होता है ॥१५३-१५६॥
हरिद्रा पञ्चमूले द्वे वीरकर्षभजीवकम् ।
एषा पञ्च पलान् भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत् ॥ १५७॥
द्रोणशेषे रसे पूते गुडस्य द्विशतं भिषक् ।
चूर्णितान् कुडवार्धांशान् प्रक्षिपेच्च समाक्षिकान् ॥ १५८॥
प्रियङ्गुमुस्तमञ्जिष्ठाविडङ्गमधुकप्लवान् ।
लोध्र शाबरकं चैव मासार्धस्थं पिबेत्तु तम् ॥ १५६॥
एष मूलासवः सिद्धो दीपनो रक्तपित्तजित् ।
आनाहकफहृद्रोगपाण्डुरोगाङ्गसादनुत् ॥ १६०॥
इति मूलासवः ।
( ३६ ) मूलासव—हरिद्रा ( हल्दी ), दोनों पञ्चमूल ( बेलगिरी, सोना-
पाठा, गम्भारी, अरणी, पाढला, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी और
गोखरु ), वीरा ( शतावरी ), जीवक, ऋषभक ये मिलित पाच पल लेकर चार
द्रोण पानी मे पकाना चाहिये और जब एक द्रोण रह जाये इसको छान लेना
चाहिये । इसमे गुड़ २०० पल मिलाना चाहिये, प्रियङ्गु, माथा, मजीठ, बाय-
विडङ्ग, मुलहठी, प्लव ( कैवर्त्तमस्ता ), लोध, पठानी लोध इनका मिलित आधा
कुढव लेकर तथा मधु आधा कुढव लेकर मिला देना चाहिये । इसको १५
दिनो तक घड़े मे बन्द करके रख देना चाहिये । यह मूलासव अग्नि-दीपक,
रक्त-पित्तनाशक, आनाह, कफ रोग, हृदयरोग, पाण्डु रोग और अङ्ग की पीड़ा
को नष्ट करता है ॥ १५७-१६० ॥
प्रास्थिकं पिप्पली पिष्ट्वा गुडं मध्यं बिभीतकात् ।
उदकप्रस्थसंयुक्तं यवपल्ले निधापयेत् ॥ १६१ ॥
तस्मात्पलं सुजातात्तु सलिलाञ्जलिसंयुतम् ।
पिबेत्पिण्डासवो ह्येष रोगानीकविनाशनः ॥ १६२ ॥