भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 616 में से

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पृष्ठ 604

६२० चरकसंहिता [ अ० १५

स्वस्थोऽप्येनं पिबेन्मासं नरः सिद्धं रसायनम् ।
इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं रोगाणां ये प्रकीर्तिताः ॥ १६३ ॥
इति पिण्डासवः ।
( ३७ ) पिण्डासव—पिप्पली, गुड और बहेडे की मज्जा प्रत्येक एक एक
प्रस्थ और पानी भी एक प्रस्थ लेकर इनको घड़े में बन्द कर जौ के ढेर मे दबा
देना चाहिये । जब यह तैयार हो जाये तो चूर्ण की मात्रा १ पल और पानी
की मात्रा चार पल पीनी चाहिये । यह पिण्डासव सब रोगो को नष्ट करता हे ।
स्वस्थ व्यक्ति भी यदि एक मास तक इसका सेवन करे, तो उसको रसायन का
फल होता है । इसके पीने से रोगो की उत्पत्ति नहीं होती है ॥१६१-१६३॥
नवे पिप्पलिमध्वाक्ते कलसेऽगुरुधूपिते ।
मध्वाढकं जलसमं चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ १६४ ॥
कुडवार्धं विडङ्गानां पिप्पल्याः कुडवं तथा ।
चतुर्थैकांशं त्वक्क्षीरी केशरां मरिचानि च ॥ १६५ ॥
त्वगेलापत्रकशटीक्रमुकातिविषाघनम् ।
हरेण्वेलुकतेजोह्वापिप्पलीमूलचित्रकान् ॥ १६६ ॥
कार्षिकांस्तान् स्थितं मासमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ।
मन्दं सन्दीपन्यत्यग्निं करोति विषमं समम् ॥ १६७ ॥
हृत्पाण्डुग्रहणीरोगकुष्ठार्शःश्वयथुज्वरान् ।
वातश्लेष्मामयांश्चान्यान्मध्वरिष्टो व्यपोहति ॥ १६८ ॥
इति मध्वरिष्टः ।
( ३८ ) मध्वरिष्ट—नये घडे को अगरु का धुआ देकर इनमे पिप्पली और
मधु का लेप करके इसमे मधु एक आढक, जल चार प्रस्थ ( शहद के बराबर
मिला कर रख देना चाहिये । इसमे बायविडंग २ पल, पिप्पली ४ पल, वंश-
लोचन, नागकेशर और मरिच मिलित १ पल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, शठो,
सुपारी, अतीस, नागरमोथा, हरेणु, रेणुका, तेजोह्वा (धामन), पिप्पलीमूल,
चीता प्रत्येक वस्तु एक कर्ष मिला कर एक मास तक रख देना चाहिये । यह
अरिष्ट मन्दाग्नि को बढाता है, यह योग विषमाग्नि को समान करता है, हृदय
रोग, पाण्डु, ग्रहणी राग, कुष्ठ, अश्र, शोथ, ज्वर, वात, कफजन्य रोगों को नष्ट
करता है ॥ १६४-१६८ ॥
समूलां पिप्पलीं क्षारौ द्वौ पञ्च लवणानि च ।
मातुलुङ्गाभयारास्नाशटीमरिचनागरम् ॥ १६९ ॥
कृत्वा समाशं तच्चूर्णं पिबेत् प्रातः सुखाम्बुना ।
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