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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

६२० चरकसंहिता [ अ० १५

स्वस्थोऽप्येनं पिबेन्मासं नरः सिद्धं रसायनम् ।
इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं रोगाणां ये प्रकीर्तिताः ॥ १६३ ॥
इति पिण्डासवः ।
( ३७ ) पिण्डासव—पिप्पली, गुड और बहेडे की मज्जा प्रत्येक एक एक
प्रस्थ और पानी भी एक प्रस्थ लेकर इनको घड़े में बन्द कर जौ के ढेर मे दबा
देना चाहिये । जब यह तैयार हो जाये तो चूर्ण की मात्रा १ पल और पानी
की मात्रा चार पल पीनी चाहिये । यह पिण्डासव सब रोगो को नष्ट करता हे ।
स्वस्थ व्यक्ति भी यदि एक मास तक इसका सेवन करे, तो उसको रसायन का
फल होता है । इसके पीने से रोगो की उत्पत्ति नहीं होती है ॥१६१-१६३॥
नवे पिप्पलिमध्वाक्ते कलसेऽगुरुधूपिते ।
मध्वाढकं जलसमं चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ १६४ ॥
कुडवार्धं विडङ्गानां पिप्पल्याः कुडवं तथा ।
चतुर्थैकांशं त्वक्क्षीरी केशरां मरिचानि च ॥ १६५ ॥
त्वगेलापत्रकशटीक्रमुकातिविषाघनम् ।
हरेण्वेलुकतेजोह्वापिप्पलीमूलचित्रकान् ॥ १६६ ॥
कार्षिकांस्तान् स्थितं मासमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ।
मन्दं सन्दीपन्यत्यग्निं करोति विषमं समम् ॥ १६७ ॥
हृत्पाण्डुग्रहणीरोगकुष्ठार्शःश्वयथुज्वरान् ।
वातश्लेष्मामयांश्चान्यान्मध्वरिष्टो व्यपोहति ॥ १६८ ॥
इति मध्वरिष्टः ।
( ३८ ) मध्वरिष्ट—नये घडे को अगरु का धुआ देकर इनमे पिप्पली और
मधु का लेप करके इसमे मधु एक आढक, जल चार प्रस्थ ( शहद के बराबर
मिला कर रख देना चाहिये । इसमे बायविडंग २ पल, पिप्पली ४ पल, वंश-
लोचन, नागकेशर और मरिच मिलित १ पल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, शठो,
सुपारी, अतीस, नागरमोथा, हरेणु, रेणुका, तेजोह्वा (धामन), पिप्पलीमूल,
चीता प्रत्येक वस्तु एक कर्ष मिला कर एक मास तक रख देना चाहिये । यह
अरिष्ट मन्दाग्नि को बढाता है, यह योग विषमाग्नि को समान करता है, हृदय
रोग, पाण्डु, ग्रहणी राग, कुष्ठ, अश्र, शोथ, ज्वर, वात, कफजन्य रोगों को नष्ट
करता है ॥ १६४-१६८ ॥
समूलां पिप्पलीं क्षारौ द्वौ पञ्च लवणानि च ।
मातुलुङ्गाभयारास्नाशटीमरिचनागरम् ॥ १६९ ॥
कृत्वा समाशं तच्चूर्णं पिबेत् प्रातः सुखाम्बुना ।

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२१

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२१

श्लैष्मिके ग्रहणीदोषे बलवर्णाग्निवर्धनम् ॥ १७० ॥ एतैरेवौषधैः सिद्धं सर्पिः पेयं समारुते । गौल्मिके षट्पलं प्रोक्तं भल्लातकघृतं च यत् ॥ १७१ ॥ (३६) पिप्पली, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, यवक्षार, पाचो नमक (सैन्धव, सामुद्र, बिड्, सचल और उद्भिद), बिजौरा, हरड, रास्ना, शठी, मरिच ओर साठ इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये । इससे कफजन्य ग्रहणीदाप मे बल और अग्नि की वृद्धि होती है । (४०) इन्ही ओषधियों न घृत सिद्ध करके वात, कफजन्य ग्रहणी मे पीना चाहिये । गुल्म रोग मे कथित षट् पल घृत या भल्लातक घृत का सेवन करना चाहिये ॥ १६६-१७१ ॥ बिडं कालोत्थवणं सर्जकायवशूकजम् । सप्तला कण्टकारी च चित्रकं चेति दाहयेत् ॥ १७२ ॥ सप्तकृत्वः स्रुतस्यास्य क्षारस्य द्वयाढकेन तु । आढक सर्पिषः पक्त्वा पिबेदग्निविवर्धनम् ॥ १७३ ॥ इति क्षारघृतम् । (४१) क्षार घृत—बिड् नमक, काल लवण ओर तुष लवण (पाञ्च नमक), सर्जक्षार, यवक्षार, सप्तला (चीका खाई), कटेरी ओर चीता इनके टुकड़े करके जलाना चाहिये । इस राख का पानी मे घोल कर सात बार छान लेना चाहिये । इस नितरे या छने हुए क्षार के दा आढक लेकर इसमे एक आढक घृत मिला कर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत अग्निवर्धक हे ॥१७२-१७३॥ समूला पिप्पली पाठा चव्येन्द्रयवनागरम् । चित्रकातिविषे हिङ्गु श्वदंष्ट्रा कटुरोहिणीम् ॥ १७४ ॥ वचा च कार्षिकान् पञ्च लवणाना पलानि च । दध्नः प्रस्थद्वये तैलसर्पिषोः कुडवद्वये ॥ १७५ ॥ चूर्णीकृतानि निष्क्वाथ्य शनैरन्तर्गते रसे । अन्तर्धूम ततो दग्ध्वा चूर्ण कृत्वा घृताप्लुतम् ॥ १७६ ॥ पिबेत्पाणितलं तस्मिञ्जीर्णे स्यान्मधुराशनः । वातश्लेष्मामयान्सर्वान्हन्याद्विषगराश्च सः ॥ १७७ ॥ (४२) पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, चविका, इन्द्रजौ, सोंठ, चीता, अतीस, हींग, गोखरू, कुटकी और वच प्रत्येक वस्तु का चूर्ण एक कर्ष मिलित

६२२ चरकसंहिता [ अ० १५ पाचों नमक एक पल, दही दो प्रस्थ, तैल और घृत मिलित दो कुड़व लेकर एक पात्र में रख देना चाहिये । ऊपर से इनको ढाप देना चाहिये । फिर इसके नीचे धीमी धीमी अग्नि जलानी चाहिये । जब दवाइयों का रस सब निकल जाये और चूर्ण जलने न पाये केवल घृत शेष रह जाये तो उतार लेना चाहिये । इस चूर्ण को घृत में मिला कर एक कर्ष मात्रा मे पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर मधुर पदार्थ खाना चाहिये । यह औषध वात, कफजन्य रोगो को, विष को तथा गर ( सयोग जन्य ) विष को नष्ट करता है ॥ १७४-१७७ ॥ भल्लातकं त्रिकटुकं त्रिफलां लवणत्रिकम् । अन्तर्धूमं द्विपलिकं गोपुरीषाग्निना दहेत् ॥ १७८ ॥ स क्षारः सर्पिषा पीतो भोज्ये चाप्यवचारितः१ । हृत्पाण्डुग्रहणीदोषगुल्मोदावर्त्तशूलनुत् ॥ १७६ ॥ ( ४३ ) भिलावा, सोठ, मरिच, पिप्पली, हरड़, बहेड़ा, आवला, तीन लवण ( सौवर्चल, सैन्धव और बिड नमक ) प्रत्येक वस्तु दो दो पल लेकर अन्तर्धूम 'अग्नि से पकाना चाहिये । इसमे अरण्ये उपलो की आच देनी चाहिये । इस क्षार को घी मे मिला कर पीना चाहिये अथवा भोजन मे, दाल, शाक मे डाल कर खाना चाहिये । हृदयरोग, पाण्डुरोग, ग्रहणीरोग, गुल्म, उदावर्त्त और शूल को यह क्षार नष्ट करता है ॥ १७६ ॥ दुरालभा करञ्जौ द्वौ सप्तपर्ण सवत्सकम् । षड्ग्रन्थां सदनं मूर्वा पाठामागर्वधं तथा ॥ १८० ॥ गोमूत्रेण समांशानि कृत्वा चूर्णानि दाहयेत् । दग्ध्वा च तं पिबेत्क्षारं ग्रहणीबलवर्धनम् ॥ १८१ ॥ इति प्रथमः क्षारः । ( ४४ ) क्षार (१)-दुरालभा, करज और पूति करज, सतवन, कुटज की छाल (या इन्द्रजौ ), षड्ग्रन्था (वच), मैनफल, मूर्वा, पाठा, अमलतास इनको परस्पर समान भाग लेकर सबके बराबर गोमूत्र मिला कर इनको जलाना चाहिये जलाकर इस क्षार का पीना चाहिये, इससे ग्रहणी (अग्नि) का बल बढ़ता है ॥१८१॥ भूनिम्बं रोहिणीं तिक्तां पटोलं निम्बपर्पटम् । दहेन्माहिषमूत्रेण क्षार एषोऽग्निवर्धनः ॥ १८२ ॥ इति द्वितीयः क्षारः । (४५) क्षार (२) - भूनिम्ब (चिरायता), रोहिणी (रोहेड़ा), तिक्ता (कुटकी), १. “चाप्यवचूर्णितः” इति च पाठः ।

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२३ पटोल, नीम की छाल, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर सब के बराबर भैंस का मूत्र लेकर जलाना चाहिये यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८२ ॥ द्वे हरिद्रे वचा कुष्ठं चित्रकः कटुरोहिणी । मुस्तं च बस्तमूत्रेण सिद्धः क्षारोऽग्निवर्धनः ॥ १८३ ॥ इति तृतीयः क्षारः । (४६) क्षार (३)—दोनो हल्दिया (हरिद्रा और दारुहल्दी), वच, कूठ, चीता, कुटकी और नागरमोथा इनको समान भाग लेकर सबके बराबर बकरे का मूत्र लेकर जलाना चाहिये। यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८३ ॥ चतुष्पलं सुधाकाण्डात्रिपलं लवणत्रयात् । वार्त्ताकीकुडवं चार्कादष्टौ द्वे चित्रकात्पले ॥ १८४ ॥ दग्धानि वार्त्ताकुरसे गुलिका भोजनोत्तराः । भुक्तं भुक्तं पचन्त्याशु कासश्वासार्शसां हिताः ॥ १८५ ॥ विसूचिकाप्रतिश्यायहृद्रोगशमनाश्च ताः । इत्येषा क्षारगुडिका कृष्णात्रेयेण कीर्तिता १ ॥ १८६ ॥ इति क्षारगुडिकाः । (४७) सेहुण्ड का डण्डा ४ पल, तीनो नमक (सौवर्चल, विड् और सैन्धव) मिलित तीन पल, वार्त्ताकी (बेगन) एक कुडव, आक ८ पल, चीता दो पल इनको जला कर क्षार बना लेना चाहिये। इस क्षार की बेगन के रस मे गोलिया बाधनी चाहिये। इन गोलियों को भोजन के पीछे खाना चाहिये। इनके सेवन से खाया हुआ भोजन शीघ्र पच जाता है, ये कास, श्वास और अर्श-रोग मे हितकारी हैं। इनसे विसूचिका, प्रतिश्याय और हृदयरोग नष्ट होते हैं। इस क्षार-गुटिका का उपदेश कृष्णात्रेय ने किया है ॥ १८४-१८६ ॥ वत्सकातिविषे पाठा दुःस्पर्शा हिङ्गु चित्रकम् । चूर्णीकृत्य पलाशाना क्षारे मूत्रस्रुते पचेत् ॥ १८७ ॥ आयसे भाजने सान्द्रात्तस्मात्कोलं सुखाम्बुना । मद्यैर्वा ग्रहणीदोषे शोथार्शः पाण्डुमान् पिवेत् ॥ १८८ ॥ (४८) वत्सक (इन्द्रजौ), अतीस, पाठा की छाल, दुःस्पर्शा (कौच), हींग और चीता इन सब को समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये। पलाश (ढाक) को जला कर उसकी भस्म को गोमूत्र मे घोल लेना चाहिये। फिर इसको छान या नितार लेना चाहिये। अब इस मूत्रयुक्त क्षार में १ इतिश्लोकार्धः कतिपयपुस्तकेषु न दृश्यते ।

६२४ चरकसंहिता [अ० १५ उपरोक्त चूर्ण को मिला कर लोहे के पात्र मे पकाना चाहिये । जब यह घट्ट (कठिन) बन जाये तो इसमे से चार मासा मात्रा गरम पानी के साथ खानी चाहिये । अथवा मद्य के साथ इसको खाना चाहिये । इससे ग्रहणीरोग, शोथ, अर्श और पाण्डुरोग नष्ट होता है ॥ १८७-१८८ ॥ त्रिफला कटभी चव्यं बिल्वनध्यमयो रजः । रोहिणी कटुका मुस्तं कुष्ठं पाठा च हिङ्गु च ॥ १८६ ॥ मधुकं मुष्ककयवक्षारौ त्रिकटुक वचाम् । विडङ्गं पिप्पलीमूलं स्वर्जिका निम्बचित्रकौ ॥ १६० ॥ मूर्वाजमोदेन्द्रयवान् गुडूचीं देवदारु च । कार्षिकं लवणानां च पञ्चानां पलिकान्पृथक् ॥ १६१ ॥ भागान्दध्नि त्रिकुडवे घृततैलेन मूर्च्छितान् । अन्तर्धूमं शनैर्दग्ध्वा तस्मात्पाणितलं पिबेत् ॥ १६२ ॥ सपिषा कफवाताशार्ग्रहणीपाण्डुरोगवान् । प्लीहमूत्रग्रहश्वासहिक्काकासक्रिमिज्वरान् ॥ १६३ ॥ शोषातिसारौ श्वयथुं प्रमेहानाहहृद्ग्रहान् । हन्यात्सर्वविषं चैव क्षारोऽग्निजननो वरः ॥ १६४ ॥ जीर्णे रसैर्वा मधुरैरश्रीयात्पयसाऽपि वा । (४६) हरड़, बहेडा, आंवला, कटभी (वापुवा या अपामार्ग), चविका, बेलगिरी, लोहभस्म, रोहिणी (रोहेडा), कुटकी, नागरमोथा, कूठ, पाठा, हींग, मुलहठी, मुष्कक (गुजराती मे मोखो), यवक्षार, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पिप्पली), वच, बायबिडंग, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, नीम की छाल, चीता, मूर्वा, अजमोदा, इन्द्रयव, गिलोय और देवदारु प्रत्येक वस्तु एक एक कर्ष ओर पाचो नमक (सौवर्चल, सामुद्र, सैन्धव, बिड् ओर उद्भिद) पृथक् २ एक एक पल लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । दधि ३ कुड़व, घृत और तैल मिश्रित ३ कुड़व लेकर अन्तर्धूम से धीरे धीरे पकाना चाहिये । जब यह चूर्ण जल जाये इसमें से पाणितल अर्थात् कर्ष परिमित मात्रा को घी के साथ पीना चाहिये । इससे कफजन्य अर्श, वातजन्य अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डुरोग, प्लीहा, मूत्रग्रह, श्वास, कास, हिचकी, कृमि रोग, ज्वर, शोष, अतिसार, शोथ, प्रमेह, आनाह, हृदयग्रह नष्ट होता है । यह क्षार सब विषों को नष्ट करता है, अग्नि को बढ़ाता है । इसके जीर्ण होने पर मधुर मास-रस के साथ अथवा दूध के साथ अन्न को खाना चाहिये ॥ १८६-१६४ ॥

अ० १५ ] ४० चिकित्सितस्थानम् ६२५

अ० १५ ] ४० चिकित्सितस्थानम् ६२५ त्रिदोषे विधिविद्वैद्यः पञ्च कर्माणि कारयेत् ॥ १६५ ॥ घृतक्षारासवारिष्टान्दद्याच्चाग्निविवर्धनान् । क्रिया या चानिलादीना निर्दिष्टा ग्रहणी प्रति ॥ १६६ ॥ व्यत्यासात्तां समस्तां च कुर्याद्दोषविशेषवित् । ( ५० ) त्रिदोषजन्य ग्रहणी-रोग मे वैद्य को चाहिये कि विधिपूर्वक पञ्च कर्मों को करावे । अग्नि को बढाने वाले क्षार, घृत, आसव, अरिष्ट आदि देने चाहिये । वात, पित्त, कफजन्य ग्रहणी रोग की जो चिकित्सा पृथक् २ कही है उन सबको सम्मिलित रूप मे दोषो को समझने वाला वैद्य प्रयोग करे ॥१६५-१६६॥ स्नेहनं स्वेदनं शुद्धिर्लङ्घनं दीपनं च यत् ॥ १६७ ॥ चूर्णानि लवणक्षारमध्वरिष्टसुरासवाः । विविधास्तक्रयोगाश्च दीपनानां च सर्पिषाम् ॥ १६८ ॥ ग्रहणीरोगिभिः सेव्याः— ग्रहणी के रोगिश्रो को चाहिये कि ये स्नेहन, स्वेदन, शुद्धि (वमन विरेचन), उपवास, अग्निदीपक, चूर्ण, लवण, क्षार, मध्वरिष्ट, सुरा, आसव नाना प्रकार के तक्र और अग्निवर्धक घृतो का सेवन करे ॥ १६७-१६८ ॥ क्रियां चावस्थिकीं शृणु । ष्ठीवनं श्लैष्मिके रूक्षं दीपनं तिक्तसंयुतम् ॥ १६६ ॥ सकूद्रूक्षं सकृत्स्निग्धं कृशे बहुकफे हितम् । परीक्ष्याऽऽमं शरीरस्य दीपनं स्नेहसंयुक्तम् ॥ २०० ॥ दीपनं बहुपित्तस्य तिक्तं मधुरसंयुतम् । बहुवातस्य तु स्नेह लवणाम्लयुतं हितम् ॥ २०१ ॥ सन्धुक्षति यथा वह्निरेषां विविधदिन्धनैः । स्नेहमेव परं विद्याद् दुर्बलानलदीपनम् ॥ २०२ ॥ नालं स्नेहसमिद्धस्य शमायान्नं सुगुर्वपि । अवस्था विशेष के अनुसार चिकित्सा विधि को सुनो— (५१) कफ प्रबलावस्था मे—रूक्ष, दीपक ( अग्निवर्धक ) और तिक्त वस्तुओं से मिश्रित वमन देना चाहिये । यदि रोगी कृश हो और उसमें कफ की प्रबलता हो तो कभी रूक्ष और कभी स्निग्ध-क्रिया अदल-बदल के करनी चाहिये । शरीर मे आमदोष की परीक्षा करके स्नेहयुक्त अग्निदीपक प्रयोग देने चाहिये । यदि पित्त की प्रबलता हो तो मधुर वस्तुओं से युक्त तिक्त, अग्नि- दीपक प्रयोग देने चाहिये और यदि वायु प्रबल हो तो लवण और अम्ल से युक्त स्नेह हितकारी है । इन विधियों से अग्नि अतिशय दीप्त हो जाती है ।

६२६ चरकसंहिता [ अ० १५ निर्बल अग्नि को दीप्त करने के लिये स्नेह ही सबसे उत्तम वस्तु है। स्नेह से बढे हुए अग्नि को शान्त करने के लिये भारी अन्न भी समर्थ नही होता। स्नेह से दीप्त अग्नि गुरु अन्न से भी नही बुझता ॥ २००-२०२ ॥ मन्दाग्निरपि पक्वं तु पुरीषं योऽतिसार्यते ॥ २०३ ॥ दीपनीयौषधैर्युक्ता घृतमात्रां पिबेत्तु सः । यया समानः पवनः प्रसन्नो मार्गमाश्रितः ॥ २०४ ॥ अग्नेः समीपचारित्वादाशु प्रकुरुते बलम् । काठिन्याद्यः पुरीषं तु कृच्छ्रान्मुञ्चति मानवः ॥ २०५ ॥ सघृतं लवणैर्युक्तं नरोऽन्नावग्रहं पिबेत् । रौक्ष्यान्मन्दे पिबेत्सर्पिस्तैलं वा दीपनैर्युतम् ॥ २०६ ॥ अतिस्नेहात्तु मन्देऽग्नौ चूर्णारिष्टासवा हिताः । (५२) जिस मन्दाग्निवाले पुरुष का मल पक्व होता है, उसको भी चाहिये कि वह दीपनीय ओषधियों से साधित घृत का पान करे। इस घृतपान से समानवायु अपने स्वाभाविक मार्ग मे आश्रित होकर जाठराग्नि के समीप विचरने लगता है, जिससे कि अग्नि को शीघ्र बल मिल जाता है। जो पुरुष कठिनाई से कठोर मल थोड़ा-थोड़ा करके बाहर करता है, उसको चाहिये कि भोजन के मध्य मे लवणों से युक्त घृत का पान करे। यदि रूक्षता के कारण अग्नि- मान्द्य हो तो दीपनीय ओषधियों से युक्त घृत या तैल पीना चाहिये। अतिस्नेह के कारण अग्निमान्द्य हो तो चूर्ण, अरिष्ट और आसव पीने हितकारी है ॥२०३-२०६॥ भिन्ने गुदोपलेपात्तु मले तैलसुरासवाः ॥ २०७ ॥ उदावर्तात्तु मन्देऽग्नौ निरूहाः स्नेहबस्तयः । दोषवृद्ध्या तु मन्देऽग्नौ शुद्धो दोषविधि चरेत् ॥ २०८ ॥ व्याधियुक्तस्य मन्दे तु सर्पिरेवाग्निदीपनम् । उपवासाच्च मन्देऽग्नौ यवागूभिः पिबेद् घृतम् ॥ २०९ ॥ अन्नावपीडिते चालं दीपनं बृंहणं च तत् । दीर्घकालप्रसङ्गात्तु कामक्षीणकृशान्नरान् ॥ २१० ॥ प्रसहानां रसैः साम्लैर्भोजयेत्पिशिताशिनाम् । लघुतीक्ष्णोष्णशोधित्वादीपयन्त्याशु तेऽनलम् ॥ २११ ॥ मांसोपचितमांसत्वात्तथाऽऽशुतरबृंहणाः । नाभोजनेन कायाग्निर्दीप्यते नातिभोजनात् ॥ २१२ ॥ (५३) गुदा के भिन्न (अतीसार) होने पर अवलेह, गुड़, तैल, सुरा और आसव देने चाहियें। उदावर्त्त के कारण अग्नि के मन्द होने पर निरूह

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२७

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२७ और स्नेहबस्तिया देनी चाहियें । दोषवृद्धि के कारण अग्नि के मन्द होने पर वमन और विरेचन से शरीर का शोधन करके दोषानुसार चिकित्सा करनी चाहिये । उपवास के कारण अग्निमान्द्य हो तो यवागू के साथ घृत पीना चाहिये । व्याधि के कारण अग्निमान्द्य होने पर घृत स्वय ही अग्निवर्धक होता है । अन्नावपीड़ित (भोजन के मध्य मे) दिया हुआ घृत अग्नि दीपक और शरीर की पुष्टि करता है । निरन्तर अतिमैथुन के कारण क्षीण हुए पुरुषो को मास खाने वाले प्रसङ्ग-वर्ग के पशु पक्षियो के मास रस को अनार आदि से खट्टा करके देना चाहिये । ये प्रसह वर्ग के पशु, पक्षी, लघु, तीक्ष्ण और उष्ण तथा शोधक होने से अग्नि को शीघ्र बढा देते है । इनका मास खाने से हो पुष्ट रहता है, इसलिये ये शीघ्र ही आदमी को पुष्ट कर देते है ॥२०७-२१२॥ यथा निरिन्धनो वह्निरल्पो वातीन्धनावृतः । स्नेहान्नपानैर्विविधै १श्चूर्णारिष्टसुरासवैः ॥ २१३ ॥ प्रयुक्तैर्भिषजा सम्यग्बलमग्नेः प्रवर्धते । जिस प्रकार बिना ईंधन के या थोड़े ईंधन से अथवा ईंधन के अधिक होने से अग्नि प्रदीप्त नहीं होती, उसी प्रकार भोजन न करने से या थोड़े भोजन से अथवा अधिक भोजन से भी जाठराग्नि प्रदीप्त नहीं होती। वैद्य के विधिपूर्वक स्नेहयुक्त अन्नविधि के चूर्ण, अरिष्ट, आसवो के सुरा के प्रयोग करने पर अग्नि का बल बढ़ता है ॥ २१३ ॥ यथा हि सारदार्वग्निः स्थिरः सन्तिष्ठते चिरम् ॥ २१४ ॥ स्नेहान्नविधिभिस्तद्वदन्तरग्निर्भवेत्स्थिरः । हितं जीर्णे मित चाश्नींश्चिरमारोग्यमश्नुते ॥ २१५ ॥ सर्वैषम्येण धातूनामग्निवृद्धौ यतेत ना । समैर्दोषैः समो मध्ये देहस्योष्माग्निसंस्थितः ॥ २१६ ॥ पचत्यन्नं तदारोग्यपुष्टयायुर्बलवृद्धये । दोषैर्मन्दोऽतिवृद्धो वा विषमर्जुनयेद् गदान् ॥ २१७ ॥ वाच्यं मन्दस्य तत्रोक्तम्— जिस प्रकार सारवान् कठोर ( अथवा सारयुक्त लकड़ी में) अग्नि देर तक बनी रहती है, उसी प्रकार स्नेहयुक्त अन्नविधि के प्रयोग से भी जाठराग्नि स्थिर हो जाता है, देर तक रहता है। हितकारी प्रथम भोजन के जीर्ण होने पर परि- मित भोजन करने वाला व्यक्ति स्थायी आरोग्य को प्राप्त करता है । धातुओं को विषम रूप न करते हुए ( समान अवस्था मे रखते हुए ही) अग्नि को बढाने १. 'स्नेहान्नविधिमिश्रिश्चै • इति पा ।

६२८ चरकसंहिता [ अ० १५ का प्रयत्न करना चाहिये। दोषो के समानावस्था मे होने से शरीर की उष्णिमा भी शरीर के मध्य मे ( जठर मे ) समानावस्था मे रहती है । यह समान अग्नि आरोग्य, पुष्टि, आयु, बल की वृद्धि के लिये अन्न का परिपाक करता है। वातादि दोषो के कारण अग्नि मन्द होने से या अति बढने से या विषम होने से ( कफ के कारण मन्द, पित्त के कारण प्रबल और वायु के विषम होने पर ) रोगा को उत्पन्न करता है। मन्दाग्नि की चिकित्सा पूर्व कह दी है ॥२१४-२१७॥ भस्मचिकित्सामाह- अतिवृद्धस्य वक्ष्यते । नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ २१८ ॥ स्वोष्मणा पावकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तथा लब्धबलो देहे विरूक्षे सानिलोऽनलः ॥ २१९ ॥ परिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ २२० ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कान्मृत्युं चोपनयेन्नरम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति ॥ २२१ ॥ अब अतिवृद्धाग्नि भस्मक रोग की चिकित्सा का उपदेश करते है- सम्प्राप्ति-जिस समय पुरुष मे कफ क्षीण हो जाता है, उस समय पित्त जाठराग्नि के स्थान मे कुपित हो जाता है, इस कुपित पित्त के साथ वायु भी मिली रहती है। यह पित्त अपनी उष्णिमा से अग्नि का बल बढा देता है। इस प्रकार से बल प्राप्त करके यह अग्नि वायु की सहायता से रूक्ष शरीर मे तीक्ष्णता ( तेजी ) से अन्न का बार-बार पचा देती है। अन्न का परिपाक करके रक्त आदि धातुओ का भी निरन्तर पाक करता रहता है। इसलिये रोगी मे दुर्बलता आ जाती है, रोग से रोगी की मृत्यु हो जाती है। अन्न के खाने से रोगी को शान्ति मिलती है, और अन्न के जीर्ण होने पर कष्ट अनुभव होने लगता है । अग्नि की वृद्धि से प्यास, श्वास, दाह, मूर्च्छा आदि रोग हो जाते है ॥२२१॥ तृट्श्वासदाहमूर्च्छाद्या व्याधयोऽत्यग्निसम्भवाः । तमत्यग्नि गुरुस्निग्धशीतैर्मधुरविज्जलैः ॥ २२२ ॥ अन्नपानैर्नयेच्छान्तिं दीप्तमग्निमिवाम्बुभिः । मुहुर्मुहुर्जीर्णेऽपि भोज्यान्यस्योपहारयेत् ॥ २२३ ॥ निर्इन्धनोऽन्तरं लब्ध्वा यथैनं न विपादयेत् । पायसं कृशरा स्निग्धं पैष्टिकं गुडवैकृतम् ॥ २२४ ॥ अद्यात्तथौदकानूपपिशितानि घृतानि च ।

अ० १५] चिकित्सास्थानम् ६२६ (१) जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि को पानी से शान्त करते हैं, इसी प्रकार इस प्रदीप्त अग्नि को गुरु, मधुर, स्निग्ध, शीतल खान-पान से शान्त करना चाहिये। अजीर्ण होने पर भी रोगी का बार-बार भोजन देना चाहिये, जिससे कि इन्धनरहित देख कर अग्नि इसका नष्ट न करे। क्योंकि इंधन न मिलने से अवसर पाकर अग्नि रोगी को नष्ट कर देता है। इसके लिये रोगी को पायस (दूध-पाक, तस्मै, खीर), कृशरा, पिट्ठी से बने स्निग्ध खाद्य पदार्थ, गुड़ से बनी वस्तुए, औदक या आनूप पशुओ का मास तथा घृत देने चाहिये।२२२-२२४। मत्स्यान्विशेषतः श्लक्ष्णान्स्थिरतोयचरास्तथा ॥ २२५ ॥ आविकं सघृत मासमाद्यादित्यग्निनाशनम् । यवागूं समधूच्छिष्टा घृत वा क्षुधितः पिवेत् ॥ २२६ ॥ (२) स्थिर पानी मे विचरने वाली चिकनी मछलिया खाने के लिये देनी चाहिये । इस प्रकार की मछलिया अतिगुरु होता है। अग्नि की वृद्धि को कम करने के लिये मेड़ के मास को घृत के साथ देना चाहिये। अथवा भूख लगने पर यवागू को मोम या घृत के साथ पीना चाहिये ॥ २२५-२२६ ॥ गोधूमचूर्णमन्थं वा व्यधयित्वा शिरा पिबेत् । (३) शिरा का वेधन कराके पीछे से गेहूँ के आटे का मन्थ (सत्तू) पिलाना चाहिये । पयो वा शर्करा सर्पिर्जीवनीयौषधैः शृतम् ॥ २२७ ॥ (४) जीवनीय ओषधियो मे पके दूध को शर्करा और घृत के साथ पिलाना चाहिये ॥ २२७ ॥ फलानां तैलयोनीनामुत्क्रुञ्चांश्च सशर्कराः । (५) जिन फलो से तैल निकलता है उन फलो से तथा शक्कर से मिला कर बनाई हुई गुझिया अग्नि को कोमल कर देती है। [तैल वाले फल माल- कंगनी या अलसी, बादाम, पिस्ता आदि] । मार्दवं जनयन्त्यग्नेः स्निग्धा मांसरसास्तथा ॥ २२८ ॥ (६) इसी प्रकार से स्निग्ध मांसरस भी अग्नि को घटा देता है ॥२२८॥ पिवेच्छीताम्बुना सर्पिर्मधूच्छिष्टेन वा युतम् । (७) मोम या शीतल जल के साथ मिला कर घृत को पिलाना चाहिये । गोधूमचूर्णं पयसा ससर्पिष्कं पिबेन्नरः ॥ २२६ ॥ (८) गेहूँ के चूर्ण को घी के साथ भून कर दूध मे मिला कर पिलाना चाहिये ॥ २२६ ॥ आनूपरससिद्धांश्चा त्रीन्स्नेहास्तैलवर्जितान् ॥ २३० ॥

६३० चरकसंहिता [ अ० १५

( ६ ) घी, वसा ( चर्बी ) और मेद इन तीन स्नेहो को आनूप मांसरस के साथ सिद्ध करके पिलाना चाहिये ॥ २३० ॥ पयसा समिता चापि घना त्रिस्नेहसंयुताम् । ( १०) दूध के साथ समिता ( मैदा, गेहूँ का बारीक आटा ) को घी, वसा और मेद से मिला कर घट्ट ( घना ) करके खाना चाहिये । नारीस्तन्येन संयुक्ता पिबेदौदुम्बरी त्वचम् ॥ २३१ ॥ (११) गूलर की छाल को स्त्री के दूध मे मिलाकर पिलाना चाहिये ॥२३१॥ आभ्या वा पायसं सिद्धमद्यादत्यग्निशान्तये । ( १२ ) अथवा गूलर के दूध और औरत के दूध से खीर पका कर खिलानी चाहिये इससे अग्नि की वृद्धि शान्त होती है । श्यामात्रिवृद्विपक्वं वा पयो दद्याद्विरेचनम् । असकृत्पित्तशान्त्यर्थं पायसप्रतिभोजनम् ॥ २३२ ॥ प्रसमीक्ष्य भिषक् प्राज्ञस्तस्मै दद्याद्विधानवित् । ( १३ ) श्यामा ( निशोथ ) और त्रिवृत् के साथ दूध पका कर विरेचन के लिये देना चाहिये । पित्त की शान्ति के लिये बार-बार दूध देना चाहिये । चिकित्सा विधि को समझने वाले बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि अवस्थानुसार भोजन करावे ॥ २३२- ॥ यत्किञ्चिन्मधुरं सर्वं मेध्यं श्लेष्मलं गुरुभोजनम् ॥ २३३ ॥ तदत्यग्निहितं सर्वं भुक्त्वा प्रस्वपनं दिवा । (१४) सामान्य रूप मे—जो कुछ मधुर, जो कुछ मेध्य (मेदुर मेद-बहुल), कफ बहुल और गुरु होता है, वह सब भोजन अग्नि वृद्धि को शान्त करने के लिये हितकारी है, इसी प्रकार से भोजन करके दिन मे सोना भी लाभदायक है ॥२३३॥ मेध्यान्यन्नानि योऽत्यग्नावप्रशान्तः समश्नुते ॥ २३४ ॥ न तन्निमित्तं व्यसनं लभते पुष्टिमेव च । कफे वृद्धे जिते पित्ते मारुते चानलः समः ॥ २३५ ॥ समधातोः पचत्यन्नं पुष्ट्यायुर्बलवृद्धये । जो मनुष्य अग्नि के बढने पर बिना उपेक्षा किये मेद-बहुल भोजनों को खाता रहता है, उसको इससे उत्पन्न विकार नहो होते, अपि तु शरीर मे पुष्टि आती है । कफ के बढने से, वायु और पित्त के शान्त होने पर अग्नि समान हो जाता है । धातुओं के समान होने पर अग्नि भी आयु, पुष्टि, बल की वृद्धि के लिये अन्न को पचाता है ॥ २३४-२३५-॥ भवन्ति चात्र—पथ्यापथ्यमिहैकत्र मुक्तं समशनं मतम् ॥२३६॥ विषमं बहु वाऽल्पं वाऽप्यप्राप्तातीतकालयोः ।

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६३१ भुक्तं पूर्वान्नशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् ॥ २३७ ॥ त्रीण्यप्येतानि मृत्युं वा घोरान्व्याधीन्सृजन्ति वा । पथ्य ( हितकारी ) और अपथ्य ( अहितकारी ) को मिला कर एक साथ खाने को 'समशन' कहते हैं । मात्रा से बहुत या थोड़ा भोजन करने अथवा भोजन के समय से पूर्व अथवा पीछे भोजन करने को 'विषमाशन' कहते हैं । प्रथम खाये हुए अन्न शेष के जीर्ण होने से बचे रहने पर पुनः भोजन करने को 'अध्यशन' कहते है । समशन, विषमाशन और अध्यशन ये तीनों ही मृत्यु अथवा भयानक रोगो को उत्पन्न करते है ॥ २३६-२३७- ॥ प्रातराशे त्वजीर्णेऽपि सायमाशो न दुष्यति ॥ २३८ ॥ दिवा प्रबुध्यतेऽर्केण हृदयं पुण्डरीकवत् । तस्मिन्विबुद्धे स्रोतांसि स्फुटत्वं यान्ति सर्वशः ॥ २३६ ॥ व्यायामाच्च विचाराच्च विक्षिप्तत्वाच्च चेतसः । न क्लेदमपगच्छन्ति दिवा तेनास्य धातवः ॥ २४० ॥ अक्लिन्नेष्वन्नमासक्तमन्यत्तेषु न दुष्यति । अविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद्विमिश्रितम् ॥ २४१ ॥ नैव दूष्यति तेनैव समं संपद्यते यथा । रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृतेष्वयनेषु च ॥ २४२ ॥ यान्ति कोष्ठे च विक्लेदं संवृते देहधातवः । क्लिन्नेष्वन्यदपक्वेषु तेष्वासिक्तं प्रदुष्यति ॥ २४३ ॥ विदग्धेषु पयःस्त्वन्यत्पयस्तेष्विवार्पितम् । नैशेष्वाहारजातेषु नाविपक्वेषु बुद्धिमान् ॥ तस्मादन्यत्समश्नीयात्पालयिष्यन्बलायुषी ॥ २४४ ॥ प्रातःकालं का किया हुआ भोजन यदि जीर्ण न हो तो भी यदि सायकाल का भोजन कर लिया जाये तो वह दोष उत्पन्न नही करता । क्योंकि दिनमे हृदय कमल के समन सूर्य के द्वारा विकसित रहता है । (हृदय अधिक क्रियाशील है, मस्तिष्क कार्य करता रहता है ) इस हृदय ( वात-सस्थान ) के जागृत रहने पर सब स्रोत खुले रहते है । मनुष्य के व्यायाम करने, चलने-फिरने से, विचार ( चिन्तन ) से, चित्त के विक्षेप से, दिन मे शरीर के धातु शुष्क हो जाते हैं । इन अक्लिन्न धातुओं मे प्रक्षिप्त अन्य अन्न ऐसे ही दूषित नहीं होता जैसे बिना विदग्ध हुए ( फटे ) दूध मे नया दूध मिलाने से कोई भेद नहीं आता । रात्रि मे हृदय की गति के कम होने से ( वात-संस्थान मस्तिष्क के सो जाने से ) और स्रोतों के बन्द हो जाने पर, कोष्ठ मे पाचन-क्रिया के रुक जाने से शरीर

६३० चरकसंहिता [ अ० १५

के धातु क्लिन्न (आर्द्र) हो जाते है। इन अपक्व और क्लिन्न स्रोतो मे जो अन्य आहार आता है, वह भी दूषित हो जाता है। जिस प्रकार गरम दूध यदि विदग्ध (विकृत) हो जाये तो उसमे अन्य जो भी दूध मिलाया जाय वह भी दूषित हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि बल और आयुष्य की रक्षा करते हुए रात्रि के भोजन के परिपाक न होने पर अन्य भोजन न करे। रात्रि का भोजन जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिये ॥२३८ २४४॥ तत्र श्लोकाः—अन्तरग्निगुणा देहं यथा धारयते च सः यथाऽन्नं पच्यते याश्च यथाऽऽहारः करोत्यपि ॥ २४५ ॥ येऽग्नयो यांश्च पुष्यन्ति यावन्तो ये पचन्ति यान् । रसादीनां क्रमोत्पत्तिर्मलानां तेभ्य एव च ॥ २४६ ॥ वृष्याणामाशुवृद्धेतुर्धातुकालोद्भवक्रमः । रोगैकदेशकृद्धेतुरन्तरग्निर्यथाऽधिकः ॥ २४७ ॥ सन्दूषयति यथा दुष्टो यान् रोगाञ्जनयत्यपि । ग्रहणी या समासाच्च ग्रहणीदोषलक्षणम् ॥ २४८ ॥ पूर्वरूपं पृथक् चैव व्यञ्जनं सचिकित्सितम् । चतुर्विधस्य निर्दिष्टा तथा चावस्थिकी क्रिया ॥ २४९ ॥ जायते च यथाऽत्यग्निर्यच्च तस्य चिकित्सितम् । उक्तवानिह तत्सर्वं ग्रहणीदोषके मुनिः ॥ २५० ॥ उपसहार—भीतरी अग्नि के गुण शरीर को किस प्रकार धारण करते हैं, अन्न का परिपाक किस प्रकार होता है, किस प्रकार आहार किन २ गुणों को करता है, कितने अग्नि हैं, ये किनका पोषण करते हैं, किन को ये पचाते है, रसादि धातुओं की क्रमश उत्पत्ति, इन धातुओं से मलादि की उत्पत्ति, तृष्णा- ओ का कारण, धातुओ की उत्पत्ति का काल, उनका क्रम, एक देश मे रोगो- त्पत्तिका कारण, अधिक अन्तराग्नि का कारण, दूषित अग्नि से उत्पन्न रोग, ग्रहणी और ग्रहणी दोष के लक्षण, उनके पूर्वरूप, पृथक् २ लक्षण, चिकित्सा अव- स्थानुसारी चिकित्सा, अत्यग्नि की उत्पत्ति और चिकित्सा इस ग्रहणी-रोग-चिकित्सित अध्याय मे इन सब विषयों का मुनि आत्रेय ने उपदेश कर दिया है॥२४५-२५०॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने ग्रहणीरोगचिकित्सित नाम पञ्चदशोऽध्याय ॥ १५ ॥


मुद्रक—प० बैकुण्ठनाथ भार्गव, आनन्द सागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।