चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२८ चरकसंहिता [ अ० १५ का प्रयत्न करना चाहिये। दोषो के समानावस्था मे होने से शरीर की उष्णिमा भी शरीर के मध्य मे ( जठर मे ) समानावस्था मे रहती है । यह समान अग्नि आरोग्य, पुष्टि, आयु, बल की वृद्धि के लिये अन्न का परिपाक करता है। वातादि दोषो के कारण अग्नि मन्द होने से या अति बढने से या विषम होने से ( कफ के कारण मन्द, पित्त के कारण प्रबल और वायु के विषम होने पर ) रोगा को उत्पन्न करता है। मन्दाग्नि की चिकित्सा पूर्व कह दी है ॥२१४-२१७॥ भस्मचिकित्सामाह- अतिवृद्धस्य वक्ष्यते । नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ २१८ ॥ स्वोष्मणा पावकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तथा लब्धबलो देहे विरूक्षे सानिलोऽनलः ॥ २१९ ॥ परिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ २२० ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कान्मृत्युं चोपनयेन्नरम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति ॥ २२१ ॥ अब अतिवृद्धाग्नि भस्मक रोग की चिकित्सा का उपदेश करते है- सम्प्राप्ति-जिस समय पुरुष मे कफ क्षीण हो जाता है, उस समय पित्त जाठराग्नि के स्थान मे कुपित हो जाता है, इस कुपित पित्त के साथ वायु भी मिली रहती है। यह पित्त अपनी उष्णिमा से अग्नि का बल बढा देता है। इस प्रकार से बल प्राप्त करके यह अग्नि वायु की सहायता से रूक्ष शरीर मे तीक्ष्णता ( तेजी ) से अन्न का बार-बार पचा देती है। अन्न का परिपाक करके रक्त आदि धातुओ का भी निरन्तर पाक करता रहता है। इसलिये रोगी मे दुर्बलता आ जाती है, रोग से रोगी की मृत्यु हो जाती है। अन्न के खाने से रोगी को शान्ति मिलती है, और अन्न के जीर्ण होने पर कष्ट अनुभव होने लगता है । अग्नि की वृद्धि से प्यास, श्वास, दाह, मूर्च्छा आदि रोग हो जाते है ॥२२१॥ तृट्श्वासदाहमूर्च्छाद्या व्याधयोऽत्यग्निसम्भवाः । तमत्यग्नि गुरुस्निग्धशीतैर्मधुरविज्जलैः ॥ २२२ ॥ अन्नपानैर्नयेच्छान्तिं दीप्तमग्निमिवाम्बुभिः । मुहुर्मुहुर्जीर्णेऽपि भोज्यान्यस्योपहारयेत् ॥ २२३ ॥ निर्इन्धनोऽन्तरं लब्ध्वा यथैनं न विपादयेत् । पायसं कृशरा स्निग्धं पैष्टिकं गुडवैकृतम् ॥ २२४ ॥ अद्यात्तथौदकानूपपिशितानि घृतानि च ।