चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२७ और स्नेहबस्तिया देनी चाहियें । दोषवृद्धि के कारण अग्नि के मन्द होने पर वमन और विरेचन से शरीर का शोधन करके दोषानुसार चिकित्सा करनी चाहिये । उपवास के कारण अग्निमान्द्य हो तो यवागू के साथ घृत पीना चाहिये । व्याधि के कारण अग्निमान्द्य होने पर घृत स्वय ही अग्निवर्धक होता है । अन्नावपीड़ित (भोजन के मध्य मे) दिया हुआ घृत अग्नि दीपक और शरीर की पुष्टि करता है । निरन्तर अतिमैथुन के कारण क्षीण हुए पुरुषो को मास खाने वाले प्रसङ्ग-वर्ग के पशु पक्षियो के मास रस को अनार आदि से खट्टा करके देना चाहिये । ये प्रसह वर्ग के पशु, पक्षी, लघु, तीक्ष्ण और उष्ण तथा शोधक होने से अग्नि को शीघ्र बढा देते है । इनका मास खाने से हो पुष्ट रहता है, इसलिये ये शीघ्र ही आदमी को पुष्ट कर देते है ॥२०७-२१२॥ यथा निरिन्धनो वह्निरल्पो वातीन्धनावृतः । स्नेहान्नपानैर्विविधै १श्चूर्णारिष्टसुरासवैः ॥ २१३ ॥ प्रयुक्तैर्भिषजा सम्यग्बलमग्नेः प्रवर्धते । जिस प्रकार बिना ईंधन के या थोड़े ईंधन से अथवा ईंधन के अधिक होने से अग्नि प्रदीप्त नहीं होती, उसी प्रकार भोजन न करने से या थोड़े भोजन से अथवा अधिक भोजन से भी जाठराग्नि प्रदीप्त नहीं होती। वैद्य के विधिपूर्वक स्नेहयुक्त अन्नविधि के चूर्ण, अरिष्ट, आसवो के सुरा के प्रयोग करने पर अग्नि का बल बढ़ता है ॥ २१३ ॥ यथा हि सारदार्वग्निः स्थिरः सन्तिष्ठते चिरम् ॥ २१४ ॥ स्नेहान्नविधिभिस्तद्वदन्तरग्निर्भवेत्स्थिरः । हितं जीर्णे मित चाश्नींश्चिरमारोग्यमश्नुते ॥ २१५ ॥ सर्वैषम्येण धातूनामग्निवृद्धौ यतेत ना । समैर्दोषैः समो मध्ये देहस्योष्माग्निसंस्थितः ॥ २१६ ॥ पचत्यन्नं तदारोग्यपुष्टयायुर्बलवृद्धये । दोषैर्मन्दोऽतिवृद्धो वा विषमर्जुनयेद् गदान् ॥ २१७ ॥ वाच्यं मन्दस्य तत्रोक्तम्— जिस प्रकार सारवान् कठोर ( अथवा सारयुक्त लकड़ी में) अग्नि देर तक बनी रहती है, उसी प्रकार स्नेहयुक्त अन्नविधि के प्रयोग से भी जाठराग्नि स्थिर हो जाता है, देर तक रहता है। हितकारी प्रथम भोजन के जीर्ण होने पर परि- मित भोजन करने वाला व्यक्ति स्थायी आरोग्य को प्राप्त करता है । धातुओं को विषम रूप न करते हुए ( समान अवस्था मे रखते हुए ही) अग्नि को बढाने १. 'स्नेहान्नविधिमिश्रिश्चै • इति पा ।