चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२६ चरकसंहिता [ अ० १५ निर्बल अग्नि को दीप्त करने के लिये स्नेह ही सबसे उत्तम वस्तु है। स्नेह से बढे हुए अग्नि को शान्त करने के लिये भारी अन्न भी समर्थ नही होता। स्नेह से दीप्त अग्नि गुरु अन्न से भी नही बुझता ॥ २००-२०२ ॥ मन्दाग्निरपि पक्वं तु पुरीषं योऽतिसार्यते ॥ २०३ ॥ दीपनीयौषधैर्युक्ता घृतमात्रां पिबेत्तु सः । यया समानः पवनः प्रसन्नो मार्गमाश्रितः ॥ २०४ ॥ अग्नेः समीपचारित्वादाशु प्रकुरुते बलम् । काठिन्याद्यः पुरीषं तु कृच्छ्रान्मुञ्चति मानवः ॥ २०५ ॥ सघृतं लवणैर्युक्तं नरोऽन्नावग्रहं पिबेत् । रौक्ष्यान्मन्दे पिबेत्सर्पिस्तैलं वा दीपनैर्युतम् ॥ २०६ ॥ अतिस्नेहात्तु मन्देऽग्नौ चूर्णारिष्टासवा हिताः । (५२) जिस मन्दाग्निवाले पुरुष का मल पक्व होता है, उसको भी चाहिये कि वह दीपनीय ओषधियों से साधित घृत का पान करे। इस घृतपान से समानवायु अपने स्वाभाविक मार्ग मे आश्रित होकर जाठराग्नि के समीप विचरने लगता है, जिससे कि अग्नि को शीघ्र बल मिल जाता है। जो पुरुष कठिनाई से कठोर मल थोड़ा-थोड़ा करके बाहर करता है, उसको चाहिये कि भोजन के मध्य मे लवणों से युक्त घृत का पान करे। यदि रूक्षता के कारण अग्नि- मान्द्य हो तो दीपनीय ओषधियों से युक्त घृत या तैल पीना चाहिये। अतिस्नेह के कारण अग्निमान्द्य हो तो चूर्ण, अरिष्ट और आसव पीने हितकारी है ॥२०३-२०६॥ भिन्ने गुदोपलेपात्तु मले तैलसुरासवाः ॥ २०७ ॥ उदावर्तात्तु मन्देऽग्नौ निरूहाः स्नेहबस्तयः । दोषवृद्ध्या तु मन्देऽग्नौ शुद्धो दोषविधि चरेत् ॥ २०८ ॥ व्याधियुक्तस्य मन्दे तु सर्पिरेवाग्निदीपनम् । उपवासाच्च मन्देऽग्नौ यवागूभिः पिबेद् घृतम् ॥ २०९ ॥ अन्नावपीडिते चालं दीपनं बृंहणं च तत् । दीर्घकालप्रसङ्गात्तु कामक्षीणकृशान्नरान् ॥ २१० ॥ प्रसहानां रसैः साम्लैर्भोजयेत्पिशिताशिनाम् । लघुतीक्ष्णोष्णशोधित्वादीपयन्त्याशु तेऽनलम् ॥ २११ ॥ मांसोपचितमांसत्वात्तथाऽऽशुतरबृंहणाः । नाभोजनेन कायाग्निर्दीप्यते नातिभोजनात् ॥ २१२ ॥ (५३) गुदा के भिन्न (अतीसार) होने पर अवलेह, गुड़, तैल, सुरा और आसव देने चाहियें। उदावर्त्त के कारण अग्नि के मन्द होने पर निरूह