भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १५] चिकित्सास्थानम् ६२६ (१) जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि को पानी से शान्त करते हैं, इसी प्रकार इस प्रदीप्त अग्नि को गुरु, मधुर, स्निग्ध, शीतल खान-पान से शान्त करना चाहिये। अजीर्ण होने पर भी रोगी का बार-बार भोजन देना चाहिये, जिससे कि इन्धनरहित देख कर अग्नि इसका नष्ट न करे। क्योंकि इंधन न मिलने से अवसर पाकर अग्नि रोगी को नष्ट कर देता है। इसके लिये रोगी को पायस (दूध-पाक, तस्मै, खीर), कृशरा, पिट्ठी से बने स्निग्ध खाद्य पदार्थ, गुड़ से बनी वस्तुए, औदक या आनूप पशुओ का मास तथा घृत देने चाहिये।२२२-२२४। मत्स्यान्विशेषतः श्लक्ष्णान्स्थिरतोयचरास्तथा ॥ २२५ ॥ आविकं सघृत मासमाद्यादित्यग्निनाशनम् । यवागूं समधूच्छिष्टा घृत वा क्षुधितः पिवेत् ॥ २२६ ॥ (२) स्थिर पानी मे विचरने वाली चिकनी मछलिया खाने के लिये देनी चाहिये । इस प्रकार की मछलिया अतिगुरु होता है। अग्नि की वृद्धि को कम करने के लिये मेड़ के मास को घृत के साथ देना चाहिये। अथवा भूख लगने पर यवागू को मोम या घृत के साथ पीना चाहिये ॥ २२५-२२६ ॥ गोधूमचूर्णमन्थं वा व्यधयित्वा शिरा पिबेत् । (३) शिरा का वेधन कराके पीछे से गेहूँ के आटे का मन्थ (सत्तू) पिलाना चाहिये । पयो वा शर्करा सर्पिर्जीवनीयौषधैः शृतम् ॥ २२७ ॥ (४) जीवनीय ओषधियो मे पके दूध को शर्करा और घृत के साथ पिलाना चाहिये ॥ २२७ ॥ फलानां तैलयोनीनामुत्क्रुञ्चांश्च सशर्कराः । (५) जिन फलो से तैल निकलता है उन फलो से तथा शक्कर से मिला कर बनाई हुई गुझिया अग्नि को कोमल कर देती है। [तैल वाले फल माल- कंगनी या अलसी, बादाम, पिस्ता आदि] । मार्दवं जनयन्त्यग्नेः स्निग्धा मांसरसास्तथा ॥ २२८ ॥ (६) इसी प्रकार से स्निग्ध मांसरस भी अग्नि को घटा देता है ॥२२८॥ पिवेच्छीताम्बुना सर्पिर्मधूच्छिष्टेन वा युतम् । (७) मोम या शीतल जल के साथ मिला कर घृत को पिलाना चाहिये । गोधूमचूर्णं पयसा ससर्पिष्कं पिबेन्नरः ॥ २२६ ॥ (८) गेहूँ के चूर्ण को घी के साथ भून कर दूध मे मिला कर पिलाना चाहिये ॥ २२६ ॥ आनूपरससिद्धांश्चा त्रीन्स्नेहास्तैलवर्जितान् ॥ २३० ॥