चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] शारीरस्थानम् ५१ जाते हैं । जिस प्रकार पिघल हुए सोना, चादी, ताम्बा, सीसा आदि मोम से लिप्त मिट्टी के साचे में डालने पर उसी मोम के आकार के पदार्थ बन जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के साचे में ढल कर वह मनुष्य रूप के होजाते हैं । इस कारण से समुदाय से उत्पन्न होने वाला गर्भ मनुष्य रूप में उत्पन्न होता है । मनुष्य योनि से उत्पन्न होने से मनुष्य को मनुष्यसे उत्पन्न हुआ कहते हैं ॥२४॥ यच्चोक्तं —यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः कस्मान्न जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्तीति, तत्रोच्यते-यस्य यस्य ह्यङ्गावयवस्य बीजे बीजभाग उपतप्तो भवति तस्य तस्याङ्गावयवस्य विकृतिरुपजायते, नोपजायते चानुपतापात्, तस्मादुभयोपपत्तिरप्यत्र, सर्वस्य चात्मजानी- न्द्रियाणि, तेषां भावाभावहेतुर्दैव, तस्मान्नैकान्तता जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्ति ॥ २५ ॥ और जो यह कहा है कि यदि मनुष्य मनुष्य से उत्पन्न होता है, तो जड़ बुद्धि माता पिता की सन्तान इनके समान जड़बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका उत्तर यह है—शुक्र-शोणित रूप बीज में जिस जिस अवयव का बीज भाग दूषित रहता है, उसी उसी अवयव में विकृति उत्पन्न हो जाती है । बीज भाग के दूषित न होने से नहीं होती । इसलिये जड़त्व और अजड़त्व अन्धत्व और अनन्धत्व दोनों ही बातों का होना सम्भव है। सब प्राणियों की इन्द्रिया आत्म- कर्म से बनती हैं। इन इन्द्रियों के होने से भाव और न होने से अभाव में दैव कारण होता है । इस कारण से जड़बुद्धि आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान अवश्य ही पिता के समान हो, यह आवश्यक नहीं। वे कभी सदृश होते और कभी नहीं होते हैं ॥ २५ ॥ न चात्मा सत्त्विन्द्रियेष्वसत्सु वा भवत्यज्ञः, न ह्यसत्त्वः कदाचि- दात्मा; सत्त्वविशेषाच्चोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति ॥ २६ ॥ इन्द्रियों के होने पर आत्मा ज्ञानी होता है, यह भी ठीक नहीं है अथवा इन्द्रियों के न होने पर अज्ञानी रहता है, यह भी नही । क्योंकि आत्मा कभी भी सत्त्वरहित नहीं रहता । सत्त्व ( मन ) की विशेषता से ज्ञान विशेष प्राप्त होता है। इसलिये आत्मा का मन के साथ सदा सम्बन्ध रहने पर बाह्य इन्द्रियों के अभाव में भी नित्य ज्ञान होता रहता है । यही आत्म-ज्ञान है ॥ २६ ॥ भवन्ति चात्र । न कर्तुरिन्द्रियाभावात्कार्यज्ञानं प्रवर्तते । यैः क्रिया वर्तते या तु सा बिना तैर्न वर्तते ॥ २७ ॥