चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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५२ चरकसंहिता [ अ० ३
जानन्नपि मृदोऽभावात्कुम्भकृन्न प्रवर्तते।
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत् ॥ २८ ॥
कर्त्ता को इन्द्रियों के अभाव से बाह्य विषयों का ज्ञान नहीं होता। जो
क्रिया जिन भावों के द्वारा उत्पन्न होती है, उन भावों के बिना वह क्रिया भी
नहीं होती। जिस प्रकार घड़े को बनाने की विधि जानने वाला कुम्हार भी,
मिट्टी न हो तो घड़ा नहीं बना सकता, इसी प्रकार बाह्य विषय का ज्ञान भी,
इन्द्रियों न हों तो नहीं होता। इसलिये इन्द्रियों के न होने से आत्मा का ज्ञानी
होने का गुण नष्ट नहीं होता। इस महान् आत्मज्ञान के महान् बल रूप
अध्यात्म ज्ञान को सुनो ॥ २७-२८ ॥
इन्द्रियाणि च सङ्क्षिप्य मनः संगृह्य चञ्चलम् ।
प्रविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञाने पर्यवस्थितः ॥ २९ ॥
सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते।
गृह्णीष्व चेदमपरं भरद्वाज विनिर्णयम् ॥ ३० ॥
निवृत्तेन्द्रियवाक्चेष्टः सुप्तः स्वप्नगतान् यदा।
विषयान् सुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यत. स्मृत ॥ ३१ ॥
इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटा कर, चंचल स्वभाव वाले मन को आत्मा
से अतिरिक्त विषयों से खींच कर आत्मा में प्रविष्ट करने पर आत्मा आत्मज्ञान
में स्थित होता है। इस अवस्था में वह सब प्रकार के ज्ञान में बे-रोकटोक जा
सकता है, इसी से विना इन्द्रियों के भी सब विषयों को देख लेता है। हे भरद्वाज !
इसलिये इस तत्त्व को भी निश्चय रूप से ग्रहण करो। जिस समय इन्द्रिया, वाणी,
चेष्टायें आदि सब शान्त होती हैं, और सोया हुआ पुरुष स्वप्नावस्था में बाह्य
सुख दुःखों को जानता है, तो भी आत्मा को अज्ञ नहीं कहते। तब भी वह
ज्ञानवान् ही रहता है ॥ २९-३१ ॥
आत्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किंचिन्न वर्तते।
नह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः ॥ ३२ ॥
तस्माज्ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च।
सर्वमेतद्भरद्वाज ! निर्णीतं जहि संशयम् ॥ ३३ ॥ इति ॥
आत्म-ज्ञान- आत्मा को छोड़ कर मनोजन्य या इन्द्रियजन्य ज्ञान अकेला
उत्पन्न नहीं हो सकता। सब अवस्थाओं मे ज्ञान का कारण आत्मा ही है,
क्योंकि असहाय वस्तु अकेली नहीं रह सकती और न बिना कारण के उत्पन्न
हो सकती है। समाधि और स्वप्नावस्था दोनों मे आत्मा ही ज्ञान का कारण