भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ४ ] शारीरस्थानम् ५३ है। इसलिये आत्मा ज्ञानी है, आत्मा ही प्रकृति ( विकार नहीं ) है, वही सब कार्यों का देखनेवाला और कारण है। हे भरद्वाज ! आत्मा का ज्ञानी होना आदि सब बातों का निर्णय कर दिया। अब संशय को छोड़ दो ॥ ३२-३३ ॥ तत्र श्लोकौ— हेतुर्गर्भस्य निर्वृत्तौ वृद्धौ जन्मनि चैव यः । पुनर्वसुमतिर्या च भरद्वाजमतिश्च या ॥ ३४ ॥ प्रतिज्ञाप्रतिषेधश्च विशदश्चाऽऽत्मनिर्णयः । गर्भावक्रान्तिमुद्दिश्य खुड्डीकां तत् प्रकाशितम् ॥ ३५ ॥ गर्भ के जन्म, निवृत्ति और वृद्धि में जो कारण हैं, उस सम्बन्ध में भगवान् आत्रेय का जो मत है और जो भरद्वाज मुनि का मत है, भरद्वाज की प्रतिज्ञा का दोष आदि पुनर्वसु कृत स्थित आत्म-निर्णय, ये सब बातें इस खुड्डीका गर्भावक्रान्ति नामक अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ३४-३५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने खुड्डीकागर्भावक्रान्ति- शारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः । अथातो महती गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'महती गर्भावक्रान्ति' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ यतश्च गर्भः संभवति, यस्मिंश्च गर्भसंज्ञा, यद्विकारश्च गर्भो, यया चानुपूर्व्याभिनिर्वर्त्तते कुक्षौ, यश्चास्य वृद्धिहेतुः, यतश्चास्याऽजन्म भवति, यतश्च जायमानः कुक्षौ विनाशं प्राप्नोति, यतश्च कार्त्स्न्येनाविनश्यन्वि- कृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥ जिन कारणों से गर्भ होता है, जिनसे कि इसकी गर्भ संज्ञा होती है, जिन विकारों का परिणाम गर्भ है, जिस अनुक्रम से गर्भाशय या माता के कोख में गर्भ बनता है, जो इस गर्भ की वृद्धि के कारण हैं, जिन कारणों से इसका जन्म नहीं होता, जिन कारणों से कोख में उत्पन्न होकर भी नष्ट हो जाता है और जिन कारणों से गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त हो जाता है, अब उनका वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥