चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिलने से प्राप्त द्वेष आदि का निग्रह करना, सोने, बैठने, चलने, देखने, आहार, विहार, अंग, प्रत्यग आदि की चेष्टाओं में 'मै कौन हूँ' किस लिये तप करता हूँ। ऐसा स्मरण करके प्रवृत्त होना, सत्कार, स्तुति आदि मे प्रसन्न न होना, निन्दा और अपमान में क्रोधित न होकर उनको सहना, भूख, प्यास, मेहनत, थकान, शीत, गरमी, वर्षा, वायु, सुख, दुःख आदि को सहन करने की शक्ति का होना, शोक, दीनता, मान, उद्वेग, मद, लोभ, राग, ईर्ष्या, भय ओर क्रोध मे चलायमान न होना, उनसे अधीर न होना, अलकार आदि वस्तुओं को अनिष्टकारी विघ्न जानना। लोक और पुरुष दोनों में सृष्टि की आदि मे ही समानता को देखना, कार्य का समय न बीत जाये इसमें भय मानना, योगक्रिया मे कभी उदासीन न रहना, प्रत्युत सदा तत्पर रहना, आलस्य न करना, अपवर्ग के लिये सत्त्व और उत्साह रखना, धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति का बल बढाते रहना, बाह्य विषयों से इन्द्रियों को रोकना, चिन्ता आदि विषयों से चित्त को रोकना, सुख दुख आदि विषयों से आत्मा को रोकना, बार बार धातुभेद से शरीरावयवों, रक्त, मल, स्नायु आदि अवयवों का ठीक २ ज्ञान करना, (जिससे वैराग्य हो), आत्मा से अतिरिक्त उत्पन्न होने वाले सब पदार्थ दुःखों के कारण और अनित्य हैं यह ज्ञान करना, सब प्रकार की प्रवृत्ति को पाप जानना, सब प्रकार के त्यागों में सुख मानना, यह मार्ग अपवर्ग के लिये है। इस मार्ग से विपरीत चलने पर पुरुष बन्धन मे बध जाता है। ये अभ्युदय के साधन अर्थात् मोक्ष के उपाय कह दिये गये हैं॥१०॥ भवन्ति चात्र—एतैरविमलं सत्त्वं शुद्धयुपायैर्विशुध्यति । मृज्यमान इवाऽऽदर्शस्तैल-चैल-कचादिभिः ॥ ११ ॥ ग्रहाम्बुद-रजो-धूम-नीहारैरसमावृतम् । यथार्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं यथाऽमलम् ॥ १२ ॥ ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत्सत्त्व संवृतायने । शुद्धः स्थिर प्रसन्नाचिर्दीपो दीपाशये यथा ॥ १३ ॥ जिस प्रकार तैल, वस्त्र और हाथ आदि से साफ करने पर दर्पण चमक उठता है, उसी प्रकार इन शुद्धि के उपायों से मलिन सत्त्व (चित्त) भी शुद्ध हो जाता है। जिस प्रकार कि राहु, बादल, धूल, धुवा या बर्फ से रहित सूर्य- विम्ब चमकता है, उसी प्रकार शुद्ध सत्त्व भी प्रकाशित होता है। जिस प्रकार सत्त्व (चित्त) को पाच इन्द्रियों ढा ढापती हैं, उसी प्रकार सूर्य को भी राहु आदि पाच वस्तुएँ आवृत करती हैं*। जिस प्रकार सुरक्षित घर में दीपक की
- धूमेनाऽऽव्रियते वह्निः यथाऽऽदर्शो मलेन च । यथोल्बेनाऽऽवृतो गर्भः तथा तेनेदमावृतम् ॥