चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] शरीरस्थानम् ७७ ज्योति शुद्ध, स्थिर और प्रसन्न होकर जलती है, उसी प्रकार इन्द्रियों से असक्त आत्मा में नियमित सत्त्व शुद्ध स्थिर होकर प्रकाशित होता है ॥११-१३॥ शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्त्तते । यया भिनत्त्यतिबलं महामोहमयं तमः ॥ १४॥ सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निस्पृहः । योगं यया साधयते सांख्यः संपद्यते यया ॥ १५॥ यया नोपैत्यहङ्कारं नोपास्ते कारणं यया । यया नालम्बते किञ्चित्सर्वं संन्यस्यते यया ॥ १६॥ याति ब्रह्म यया नित्यमजरः शान्तमक्षरम् १ । विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञानं च सा मता ॥ १७॥ शुद्ध सत्त्व से जो निर्मल सत्य बुद्धि उत्पन्न होती है, जिस बुद्धि के द्वारा अति बलवान् महा मोहयुक्त अन्धकार का नाश करता है, जिसके द्वारा सब पदार्थों के स्वभाव को जानता है, जिसके द्वारा वह निःस्पृह बनता है, जिसके द्वारा विषयों से हटे मन को आत्मा में लगाकर 'योग' करता है और जिस बुद्धि के द्वारा वह तत्त्वज्ञानी बनता है । जिसके द्वारा वह अहङ्कार के वश नहीं होता, जिसके द्वारा सुख दुःख के कारणों का सेवन नहीं करता, जिसके द्वारा कहीं भी आश्रय-स्थान नहीं बनाता, जिसके कारण सब कुछ त्याग करता है, जिसके द्वारा नित्य, अजर, शान्त, अव्यय ब्रह्म-मोक्ष को प्राप्त करता है, उसी बुद्धि को विद्या, सिद्धि, मति, मेधा अर्थात् प्रज्ञा और ज्ञान नाम से कहते हैं ॥१४-१७॥ लोके विततमात्मानं लोकं चाऽऽत्मनि पश्यतः । परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति ॥ १८॥ लोक में अपने आत्मा को, तथा अपने आत्मा में लोक को देखनेवाले, तथा परमात्मा और अवर प्रकृति (प्रधान प्रकृति) आदि को देखनेवाले पुरुष में ज्ञान के द्वारा उत्पन्न हुई शान्ति कभी नष्ट नहीं होती ॥१८॥ पश्यतः सर्वभावान् हि २ सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते ॥ १९॥ सब अवस्थाओं में, सब भावों पदार्थों को देखते हुए इनमें राग और द्वेष न करने से समबुद्धि रहने के कारण ब्रह्म रूप हुए शुद्ध सत्त्व के साथ [धर्म और अधर्म का] संयोग नहीं होता ॥१९॥ १. शान्तमव्ययम् इति च पाठ । २ 'सर्व भूतानि' इति च पाठः ।