भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ६ ] शारीरस्थानम् ७६ शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते भिषग्विद्यया, ज्ञात्वा हि शरीरतत्त्वं शरीरोपकारकरेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते । तस्माच्छरीरवि- चयं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ३ ॥ शरीर का विचय अर्थात् रचनाविज्ञान (प्रविभाग रूप से ज्ञान) शरीर के उपकार के लिये आवश्यक है । शरीर का यथार्थ तत्त्व जान कर ही शरीर के लिये उपयोगी पदार्थों में ज्ञान उत्पन्न होता है। इसलिये बुद्धिमान् शरीर के रचनाविज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं ॥ ३ ॥ तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि । यदा ह्यस्मिन् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा क्लेशं विनाशं वा प्राप्नोति । वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूनां वृद्धि ह्रास- गमनमकार्त्स्न्येन प्रकृत्या च ॥ ४ ॥ इसमें शरीर शब्द से अभिप्राय आत्मा (चेतना) के आश्रय स्थान, पञ्च महाभूतों के विकारों का समुदाय तथा धातुओं के उचित प्रमाण में (समयोग में) मेल को धारण करने वाला शरीर है । जिस समय इस शरीर के भीतर रस, रक्त आदि धातु विषम हो जाते हैं, उस समय शरीर में क्लेश होता है, अथवा शरीर विनष्ट हो जाता है। धातुओं में सम्पूर्ण रूप में अथवा एकांश में वृद्धि और ह्रास होना 'धातुओं का विषम होना' कहाता है ॥ ४ ॥ यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिह्रासौ भवतः । यद्धि यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीतगुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं संपद्यते ॥५॥ उपयुक्त भैषज्य से परस्पर विरोधी धातुओं की वृद्धि और ह्रास एक साथ होता है। जो औषध जिस धातु की वृद्धि करने वाली है वह औषध उस धातु से विपरीत गुणवाली धातु में ह्रास करती है। [जैसे-दूध, कफ और शुक्र आदि की वृद्धि करता है साथ ही अपने से विरोधि गुणवाले पित्त और रक्त का ह्रास भी करता है। कहीं २ सजातीय होकर गुण विपरीत होने से धातु का ह्रास करता है जैसे-गोमूत्र द्रव होकर भी कटु उष्ण है वैसे कफ- नाशक भी है ] ॥ ५ ॥ तदेवं तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां साम्यकरं भवति । अधिकमपकर्षति, न्यूनमाप्याययति ॥ ६ ॥ इसलिये भली प्रकार से प्रयोग की हुई औषध एक समय में ही न्यून तथा बढ़ी हुई धातुओं को समान करती है और बढ़ी हुई धातु को कम करती है और कम हुए धातु को बढ़ाती है ॥ ६ ॥