चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८० चरकसंहिता [अ० ६ एतावदेव हि भेषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धा- तूनां साम्यं स्यात् । स्वस्था ह्यपि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारविकारांश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं, सात्म्यसमाज्ञातानेक- प्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसमाज्ञातया चेष्टया सममिच्छ- न्ति कर्तुम् ॥ ७॥ औषध प्रयोग तथा स्वस्थ-वृत्त के पालने का यही फल है कि धातुओं की समानता रहे। बुद्धिमान् पुरुष स्वस्थ अवस्था में भी धातुओं मे समता रखने के लिये मधुरादि रस, गुरु आदि गुणों को तथा यवागू आदि आहार के विकारों का क्रम से उपयोग करते हैं। अर्थात् मधुर रस खाने से उत्पन्न हुए कफ की वृद्धि को शान्त करने के लिये कटु रस आदि का उपयोग करते हैं। गुरु आदि गुण के पदार्थों के सेवन के पीछे लघु गुण वाले पदार्थों का उपयोग, यवागू ( लप्सी ), आदि खा कर इसके पाक के लिये पेया आदि का उपयोग करते हैं, यह क्रम है। सात्म्य ( अनुकूल ) रूप से जाने गये अनेक प्रकार के वा बहुत से पदार्थों का उपयोग करते हुए उससे विपरीत गुण करनेवाली चेष्टा से पुनः समान करने की इच्छा करते है । [ जमे—मधुर प्रकार के आहार को खाने से मधुर के समान कफकी वृद्धि होने से कफ का क्षय करनेवाली विपरीत व्यायाम क्रिया करते हैं। इससे समानता आ जाती है ] ॥ ७ ॥ देश-कालात्म-गुण-विपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणा च क्रियोपयोगः सम्यक् सर्वांतियोगसधारणमुदीर्णानां च गतिमतां साहसाना च वर्जनं स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूना साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते ॥ ८ ॥ संक्षेप में स्वस्थवृत्त—देश विपरीत कर्म ( मरु देश में सोना ), काल विप- रीत कर्म ( वसन्त में व्यायाम ), आत्म विपरीत कर्मों ( स्थूल शरीर मे व्यायाम, जागरण आदि ) तथा आहार-विकारों की क्रियाओं का ठीक प्रकार से उपयोग, काल, बुद्धि और इन्द्रियों के अर्थों के मिथ्यायोग ( अतियोग, मिथ्यायोग तथा अयोग ) का परित्याग, गतिशील मल ( पाखाना ), आदि के उपस्थित बेगों को न रोकना, साहसिक कर्मों का परित्याग करना यह स्वस्थवृत्त है। यह स्वस्थ- वृत्त धातुओं की समानता के लिये हो उपदेश किया जाता है ॥ ८ ॥ धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारवि- हारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रास तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभू- यिष्ठैर्वाऽप्यभ्यस्यमानैः ॥ ६ ॥ धातु अपने समान गुणों से तथा अपने अधिक समान गुणवाले आहार विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ते हैं और अपने विपरीत गुणों से तथा