छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषार्थी पति को अपमान की आग में जलते देखकर उनका हृदय चूर चूर हो रहा था। उनके महल की बगल में ही दुर्गाबाई का महल था। उन्होंने राणुबाई के सामने अपनी सौत दुर्गाबाई को रात में बुलाया था। उन्हें विश्वास में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "दुर्गावती युवराज की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है। हमें उनको सँभालना चाहिए।" दुर्गाबाई ने चुपचाप अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया। एक बार सुपे के जाधवराव के घर शम्भूराजा को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया था। उसी समय विशिष्ट अतिथियों को भोजन परोसने के लिए जाधवराव की रूपवती कन्या दुर्गा सामने आयी थी। उसकी स्त्री सुलभ विनम्रता, शालीन व्यवहार, मीठी वाणी आदि ने पहली नजर में ही शम्भूराजा को आकर्षित कर लिया था। दुर्गा येसूबाई की भाँति लम्बी और गोरी नहीं थी। इसके विपरीत वे कुछ नाटे कद की, थोड़ी मोटी किन्तु आकर्षक शरीर और सुन्दर तथा कोमल कपोलों वाली लड़की थीं। उनकी आँखें येसूबाई जैसी बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी नहीं थीं, किन्तु छोटी दिखने वाली उनकी आँखों में किसी को भी वशीभूत कर लेने वाला विलक्षण जादू था। दुर्गा के साथ एक-दो बार नजरें मिलीं और शम्भूराजा का सुपे और बारामती की ओर आना-जाना बढ़ गया। शिकार के बहाने वे करहा नदी के किनारे-किनारे सुपे के जाधवराव के घर पहुँच जाते थे। कुछ ही दिनों में शम्भूराजा की इस भेदभरी यात्रा का पता चल गया। उन्होंने स्वयं ही अपने पतिदेव के लिए दुर्गाबाई का हाथ माँग लिया। विवाह के बाद एक दिन दोपहरी में येसूबाई दुर्गा से मन्दिर में मिलीं। दुर्गा के कोमल हाथों को अपने हाथों में लेते हुए येसूबाई ने कहा, "एक बात ध्यान में रख ! तुम्हें इस राजमहल में यों ही नहीं लाया गया है। शम्भूराजा जैसा जलता- धधकता अंगारा सँभालना मेरे अकेले के बस का नहीं है। इसीलिए तुम्हें अपनी बड़ी बहन की सहायता के लिए मैं तुम्हें ले आयी हूँ।" येसूबाई का स्वभाव अधिक बोलने वाला था किन्तु दुर्गाबाई शान्त स्वभाव की और कम बोलने वाली थीं। येसूबाई ने उसे अपने समीप लाकर कहा, "दुर्गा ! इसके बाद आने वाला समय तुम्हारे और मेरे लिए बहुत कठिन है। शरीर की शिथिलता और पेट में आठ महीने का बच्चा ले युवराज के पीछे भागना मेरे लिए सम्भव नहीं है। दुर्गा ! युवराज को सँभालोगी न ? करोगी न उनकी सहायता ?" "दीदी हम आपकी आज्ञा के बाहर हैं क्या ?" दुर्गा ने कहा। एक रात शम्भूराजा सारी रात लगातार कुछ लिखते हुए बैठे रहे। उन्होंने बिना किसी लिपिक अथवा कवि कलश की सहायता लिए यह कार्य आरम्भ किया था। पलंग पर लेटी येसूबाई की आँखें जड़ हो रही थीं। बीच-बीच में उनकी नींद उचट जाती थी, तब सम्भाजी :: 101