छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचला तो वे अत्यन्त चिन्तित हो गयीं। एक दिन प्रातःकाल संभाजी राजा ने अपनी लम्बी पूजा समाप्त की। पवित्र मन से नंगे शरीर मन्दिर से बाहर आये। उसी समय अचूक निशाना साधकर येसूबाई सामने आयीं और अत्यन्त विनम्र स्वर में बोलीं, "युवराज! इतनी तामसी वृत्ति ठीक नहीं है। संयम रखें और संघर्ष को टालें।" अपने पैरों में पड़ी युवराज्ञी की चिन्ता किये बिना शम्भुराजा बोले- "युवराज्ञी तुम कुछ भी कहो या समझो। यह संभाजी अब तुम्हारे स्वराज के लिए निरर्थक हो गया है।" "तो क्या इसीलिए आप उस दगाबाज दिलेरखान की गोद में अपना सिर रखने के लिए निकले हैं?" येसूबाई की आँखों में क्रोध की चिनगारियाँ नाचने लगीं। उन्होंने गरजते स्वर में पूछा, "आपको मालूम है कि कौन है यह दिलेरखान ? पुरन्दर के घेराव में अपने वीर मुरार बाजी का सिर काटने वाला चंडाल यही है। युवराज धैर्य धारण करो। सोचो।" "तो यहाँ रुककर हम करेंगे क्या? इस राज्य का युवराज होते हुए भी हमें युद्ध में जाना नहीं है, अपने राजमहल में रहना नहीं है हजार दो हजार घोड़ों की सेना भी हम तैयार नहीं कर सकते, प्रजा की छोटी सी फरियाद भी सुनने की आज्ञा हमें नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या हमें सज्जनगढ़ पर जाकर केवल तालियाँ बजाते हुए जिन्दगी काटनी है। शम्भुराजा के चेहरे पर दुख की छाया स्पष्ट दिख रही थी। वे अधीर स्वर में बोले, "येसू! आजकल मुझे अकारण भी भय लगने लगता है। अगले महीने हम दोनों छोटे युवराज राजाराम को लेकर पिताजी से मिलने जाने वाले थे। अपने कुल का दीपक उनके चरणों में समर्पित करने वाले थे। परन्तु उसकी जगह - उससे पहले हमें जंजीरों से जकड़कर जेरबन्द करके, गर्दन में फाँस लगाकर रायगढ़ में प्रस्तुत होने का आदेश पिताजी ने नहीं दिया, यही बहुत बड़ी कृपा है।" "युवराज! एक पक्ष से ही इतना क्यों सोच रहे हो? अपने वीर पिता के सम्बन्ध में कुछ नहीं सोचते हो? जो कुछ भी चल रहा है, वह बहुत गलत चल रहा है।" येसूबाई ने युवराज से कहा। संभाजी राजा ने अपनी उद्विग्नता और अपमान के ज्वार को भीतर ही भीतर दबाते हुए कहा, "अपने युवराज की निन्दा करने वाला इस प्रकार का पत्र पिताजी को नौकर के हाथ क्यों भेजना चाहिए था। सामने बुलाकर हमारी खाल भी खींच लेते तो भी मुझे इतना दुख न होता।" येसूबाई एक महीने में ही बच्चे को जन्म देने वाली थीं! उनके पेट का आकार बहुत बढ़ गया था और शरीर शिथिलता आ गयी थी किन्तु ऐसे समय में भी अपने 100 · सम्भाजी