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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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विचार हो रहा था कि हिन्दवी स्वराज को दो भागों में बाँट दिया जाय। रायगढ़ के साथ पूरे मावल प्रदेश को छोटे युवराज अर्थात राजाराम को दे दिया जाय और बिना भरोसे का जिंजी वाला हिस्सा शम्भुराजा को दिया जाय। विरोधी पक्ष के लोग शर्त लगाकर कह रहे थे कि शिवाजी महाराज का भी ऐसा ही विचार है। श्रृंगारपुर का वनवास न तो सहन हो रहा था न ही समाप्त। इसी प्रकार घाव पर नमक छिड़कने की तरह दिलेरखान की ओर से एक और सन्देश आ पहुँचा। "बदनसीब शहजादे, शम्भूराजे! अपने कार्यकर्ताओं द्वारा इतनी अच्छी सेवा करने के बाद भी तुम किसके फैसले का इन्तजार कर रहे हैं? वहाँ सुदूर जिंजी जाने की अपेक्षा भीमकाठ की बादशाह की छावनी शामियाना करीब नहीं है क्या? दिल में बिना कोई शंका रखे हमारे पास आ जाओ तुम्हारे स्वागत के लिए हमारे शामियानों के दरवाजे कब से बेसब्र हैं।" दिलेरखान के इस ताजे खत से शम्भुराजा सावधान हो गये। मन्दिर के देवता पत्थर बनकर बैठे थे और दूर मस्जिद के ऊपर चाँद तारे उनके विवश मन को संकेत कर रहे थे। मित्रता का हाथ बढ़ाने वाले दिलेरखान कोई सरल आदमी नहीं था। लम्बा नारियल के पेड़ जैसा, मजबूत काठी का दिलेरखान एक कट्टर रोहिला था। गगा यमुना का पानी पिया हुआ, औरंगजेब के दरबार में सिर ऊँचा करके खड़ा होने वाला योद्धा था। दिलेरखान को यही इच्छा हमेशा तड़पाती रहती थी कि वह आलमगीर औरंगजेब की कुछ ऐसी अद्भुत सेवा कर दे कि वे चकित रह जायें। एक दिन कभी दरबार में उसे सबसे ऊँचा स्थान देकर उसकी पगड़ी में स्वयं सम्मान का चार चाँद लगाये। काबुल और कंधार से लेकर बंगाल तक औरंगजेब को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। शिवाजी महाराज ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे। औरंगजेब अपने विशिष्ट मित्रों की मंडली में कहता था- "यदि हमने शिवाजी को जीत लिया तो समझो सारी दुनिया फतेह कर ली।" दिलेरखान सोचता था कि बादशाह की ऐसी मनोदशा में यदि वह शिवाजी के कलेजे के टुकड़े संभाजी को अलग करके औरंगजेब के कदमों में पेश कर दे तो कितने आनन्द की बात होगी? इसी इच्छा की पूर्ति के लिए वह दो बार फन्दा फेंककर अधीर होकर बैठा था। वह अपने गुप्तचरों से रायगढ़ में संभाजी की उपेक्षा और उनके अपमान की छोटी-छोटी खबरें लेता रहता था। शम्भूराजा ने भी बड़ी चतुराई से नये नये दाव खेलना आरम्भ किया। उन्होंने जोत्याजी केसकर को गुप्त रूप से दिलेरखान के मुल्क में भेज दिया। उन्होंने परिस्थिति के सूक्ष्म निरीक्षण का आदेश दिया। इस बात का पता जब येसूबाई को सम्भाजी :: 99