छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतो देखा नहीं जाता था। उनका शरीर काँप रहा था। युवराज पत्थर की तरह जड़वत् होकर वहीं बैठ गये। बहुत समय तक कोई कुछ बोला नहीं। अन्त में शम्भूराजा एक गहरी साँस छोड़ते हुए निराश स्वर में बोले, "देखो वह दिलेर खान शत्रु होकर भी कितनी समझदारी की बात हमें सिखाता है। माया, ममता, नाते, रिश्ते सब झूठ हैं। अनेक बार शत्रुओं के मुख से भी पवित्र सूक्तियाँ निकलती हैं। "राजन् कृपा करें! आप धीरज न छोड़ें।" कविराज ने व्याकुलता से कहा। "इसके अतिरिक्त आज तक हम कर ही क्या रहे हैं?" गहरी साँस छोड़ते हुए शम्भूराजा बोले, "पौने दो वर्ष तक पिताजी का असह्य वियोग के बाद उनसे मिलने की प्रतीक्षा हम कितनी उत्सुकता से कर रहे थे? कर्नाटक की ओर जाने से पहले पिताजी ने हमें वचन दिया था कि आने के बाद मेरी शिकायतों और अधिकारियों के आरोपो के सम्बन्ध में हमारे साथ गम्भीर चर्चा करेंगे। किन्तु "युवराज ?" "हाँ। किन्तु अब न मिलना न सीधी नजर से देखना, न ही प्रेमपूर्ण कोई संवाद या पत्र। बिना स्पष्टीकरण का अवसर दिये हमें दोषी घोषित कर दिया गया है। महाराज ने हमारे लिए भेजा भी तो यह फटे जूतों का हार।" जैसे किसी बाघ के बच्चे को तेजधार वाले तीरों से घायल करके छोड़ दिया जाता है और वह पीड़ा से छटपटाता रहता है, उसी तरह शम्भूराजा बेचैनी से छटपटा रहे थे। उन्होंने भोजन नहीं किया। दोपहर ढल गयी। परछाइयाँ लम्बी होने लगीं। थोड़े समय बाद युवराज्ञी डरते डरते भोजन की थाली लेकर आयीं। शम्भूराजा ने उसे तत्काल दूर हटा दिया। युवराज बिस्तर पर छटपटा रहे थे। बिस्तर मानो अंगारों का ढेर बन गया था। उसमें युवराज का सारा शरीर जल रहा था। युवराज्ञी आगे आयीं। ज्वर से तपते शम्भूराजा गौर भाल पर हाथ हल्के से फेरती हुई बोलीं "इतना ग्लानिग्रस्त न हों। ये दिन भी बीत जाएँगे। खुद को सँभालें।" "येसू कैसे सँभालूँ और कैसे सँवारू ? यहाँ कर्मचारी लोग गन्दा कीचड़ उछाल रहे हैं। वहाँ माँ सोयराबाई महाराज के बिस्तर के चारों ओर मेरे विरोध में ईर्ष्या की अगरबत्ती रात दिन जला रखी है। केवल ममत्व के भूखे शिवाजी महाराज के पुत्र के भाग्य में पिता की छाया तक सम्भव नहीं है। आज रायगढ़ दुर्जनगढ़ बन गया है। येसू आज हम न किसी के रह गये हैं और न हमारा कहने के लिए ही कोई बचा है।" विरोधियों के षड्यन्त्र रुक नहीं रहे थे। रायगढ़ और पन्हालगढ़ के आसपास मे शम्भूराजा के निजी जासूस भी खबरें ला रहे थे। उनके अनुसार अष्टप्रधानों के महलों शिवाजी महाराज के दरबार में कुछ अलग ही राजनीति चल रही थी। वहाँ ५४ सम्भाजी