छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमें गूँज उठी, "कलश जो भी हो पढ़कर सुनाओ।" अपने को किसी प्रकार सँभालते हुए कविराज धीमी गति से एक-एक शब्द पढ़ने लगे— "परन्तु आपके एक-एक कारनामे हमारे कानों तक आये और हम धन्य हो गये। युवराज! आप कोई बच्चे नहीं हैं, इक्कीस-बाइस वर्ष के जवाँमर्द हो चुके हैं। हमारी पीठ पीछे आपने न केवल कर डुबाने वालों को माफी दी बल्कि हमारे कर्मचारियों को बार-बार अपमानित किया। हमारे अष्टप्रधानों को आपने समझ क्या रखा है? विगत पचीस-पचीस तीस-तीस वर्षों से हमारे साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वराज के हित में रात-दिन काम करने वाले, हमारे लिए प्राणों की बाजी लगाने वाले वे हमारे अभिन्न साथी हैं। उनकी आयु उनके अनुभव और उनकी सेवा का लिहाज न करके आपने सदैव ही उनका अपमान किया है और उन्हें सताया है। आप मुझसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। किन्तु इसके बाद अपना मुँह दिखाने का कष्ट न करें। पत्र को विराम देते हैं।" कवि कलश भय दुःख और आश्चर्य से मौन हो गये । उनका हाथ थरथराने लगा। दरबार में उपस्थित शम्भूराजा के सम्बन्धी हित मित्र सभी पत्थर की भाँति जड़ हो गये। कविराज ने शम्भूराजा की ओर दुखभरी दृष्टि फेरी। वे दुख की आग में जल रहे थे। फिर भी शम्भूराजा ने पत्र को आगे पढ़ने का संकेत किया। इतने में येसूबाई ने कड़े शब्दों में कहा, "रुक जाओ"। भरी सभा में लोगों के सामने अपना दुखड़ा रोने या बताने की उनकी इच्छा नहीं थी। फिर भी उनकी आँखें भर आयीं। येसूबाई ने फिर कहा, "बस! बस! कविराज । अब आगे एक भी शब्द हमसे सुना नहीं जाएगा।" "कविराज! रुक जाना ही ठीक है।" राणूबाई ने कहा। "क्यों? क्यों नहीं सुना जाएगा? ये शब्द अपने शिवप्रभु के ही हैं। कविराज रुको नहीं। क्योंकि आधा-अधूरा पत्र सुनकर लोग चले गये तो कल इससे भी अधिक अफवाहों के बुलबुले उठेंगे। उससे तो यही अच्छा है कि जो भी है वह लोगों के कानों तक जाए।" कवि कलश पत्र आगे पढ़ने लगे— "अभी भी यदि भूले बिसरे आपमें कुछ विवेक बुद्धि बची हो तो हमारा सुझाव है कि मुझसे मिलने पन्हाला आने के बदले आप सज्जनगढ़ चले जाइए। वहाँ श्री रामदास स्वामी के सत्संग में कुछ समय रहिए। कुछ सदाचार और सद्व्यवहार सीखिए। समय से पहले समझदार हो जाइए। स्वामीजी का प्रसाद लेकर जीवन भर सुखी रहिए।" यह पत्र सुनकर सारा दरबार अवाक रह गया। बिना कुछ कहे लोग धीरे-धीरे निकल गये। पिलाजी शिर्के भी बहुत दुखी मन से बाहर निकले। युवराज्ञी की ओर सम्भाजी . 97