छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंचार अपमान और अवहेलना का अंगार कितना दाहक होता है, इसकी कल्पना कोई भावुक और स्वाभिमानी व्यक्ति ही कर सकता है। संभाजी राजा अपने सैनिकों के साथ सज्जनगढ़ के दरवाजे के पास पहुँचे तो अत्यधिक विचार मंथन के कारण उनका सिर दुखने लगा था। ऐसे सिरदर्द की दवा यही है कि या तो गैंडे की तरह पत्थर पर सिर पटक-पटक कर हमेशा के लिए शान्त हो जाना या तुकाराम अथवा स्वामी रामदास जैसे किसी सन्त के चरणों में मत्था टेककर उनके ज्ञान के कुएँ से अमृत पान करना और उसी आधार पर जीवन की सफलता को ढूँढ़ना। किन्तु आजकल युवराज जहाँ भी जाते थे, दुर्दैव की अघोरी छायाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। जिस दिन युवराज सज्जनगढ़ पहुँचे उससे ठीक एक दिन पहले स्वामी जी कोल्हापुर की ओर निकल गये थे और पन्द्रह दिन तक उनके लौटने की सम्भावना नहीं थी। येसूबाई के न रहने पर दुर्गाबाई युवराज की देखभाल कर रहीं थीं। राणूबाई युवराज को यही समझाने का बार-बार प्रयत्न कर रही थीं कि आज नहीं तो कल सारी उलझनें अपने आप सुलझ जाएँगी। इसलिए युवराज को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। शम्भूराजा भी सज्जनगढ़ पर अपना मन बहलाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने गढ़ के एक छोर पर स्थित अन्न मारुति के दर्शन किये। अपने पीछे लगे सारे संकट दूर हो जायें इसके लिए वे मारुति और शनिदेव की उपासना कर रहे थे। अनेक बार अपने रक्षकों की एक टुकड़ी लेकर वे बाहर निकलते थे। कभी वे डोरकटी पतंग की भाँति गढ़ के आसपास घूमते थे तो कभी रामगढ़ी के पास जाकर ध्यानस्थ हो जाते थे। आकाश में सफेद बादलों को देखकर उन्हें येसूबाई और कविकलेश की बहुत याद आती थी। एक दिन सन्ध्या काल लिम्ब गाँव का सदानन्द गोसावी दौड़ता हुआ युवराज के पास आया। उसने अपने मठ की बन्द की गयी वृत्ति को फिर से शुरू करने की माँग की। युवराज ने दूसरे दिन उसका निर्णय करने का निश्चय किया। उस रात शम्भूराजा का मन बहुत आश्वस्त और शान्त था। बहुत दिनों के बाद राज्य के कार्यव्यापार में ध्यान देने का उन्हें अवसर मिला था। दुर्गाबाई और राणूबाई के साथ चर्चा करते हुए बड़े महाराज का प्रसंग आ गया। शम्भूराजा की मुखमुद्रा विषादग्रस्त हो गयी। यह देखकर राणूबाई ने पूछा, "शम्भूराजा! कितना गुस्सा करोगे हमारे पिताजी पर?" 106 :: सम्भाजी