छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको मालूम पड़ता कि उनका पुत्र सचमुच एक ढोंगी तान्त्रिक के जाल में फँस गया है तो आपको कब का निकाल फेंक दिया होता, कविराज। " कवि कलश कुछ अधिक नहीं बोल पाये। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर इतना ही कहा, "राजन् अपने आपको सँभालें।" दोपहर के समय काली घटाएँ घिर आयी थीं। श्रृंगारपुर पर उनकी छाया पड़ रही थी। अपने ढाई हजार घुड़सवारों के साथ संभाजी सज्जनगढ़ की ओर निकल रहे थे। उन्हें और राणूबाई तथा दुर्गाबाई को बिदा करने के लिए आधा शहर सीमा के पास जमा हो गया था। बिदाई के समय कवि कलश का गला भर आया था। येसूबाई को लेकर आयी पालकी एक विशाल जामुन के पेड़ के नीचे रुकी थी। येसूबाई का चेहरा सूज गया था। आँखें एकदम उतर आयी थीं। उनका चेहरा आसमान के बादलों की तरह दुख से भर गया था। उनकी आँखों से आँसू बरसने लगे। आँखों का काजल गोरे कपोलों पर उतर आया। शम्भूराजा ने अपने उत्तरीय से उनके आँसू पोंछने का प्रयास किया। येसूबाई और दुर्गाबाई राणूबाई के पास गयीं। राणूबाई ने दुर्गाबाई की पीठ पर हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में बोली, "सँभालो।" शम्भूराजा ने राणूबाई से बार- बार आग्रह किया कि वे येसूबाई के साथ रहें। किन्तु राणूबाई ने कहा, "शम्भूराजा मैं आपको सज्जनगढ़ में स्वामी जी के दरवाजे पर पहुँचा दूँगी और वहीं से वाई चली जाऊँगी।" शम्भूराजा को कुछ उदास देखकर, येसूबाई उन्हें सान्त्वना देते हुए बोली— "मुझे विश्वास है युवराज, आपको सज्जनगढ़ पर स्वामी जी मिलेंगे। मन का सारा भ्रम दूर हो जाएगा। ये दिन भी बीत जाएँगे।" "युवराज्ञी अब आप भी श्रृंगारपुर में नहीं रहिए।" "तो फिर?" "शीघ्र ही पन्हाला पहुँचिए।" "पन्हाला? वह क्यों?" येसूबाई ने आश्चर्य से पूछा। "आपको पता नहीं है क्या? हमारे पिताजी बहुत थक गये हैं। बहुत बुड्ढे दिखाई देने लगे हैं। उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए अपने घर का कोई उनके निकट नहीं होना चाहिए क्या?" संभाजी राजा ने कहा। यह सुनकर येसूबाई की आँखों से आँसू अपने आप सूख गये। पति के ऊपर अभिमान के कारण उनका सिर ऊँचा हो गया। सम्भाजी .: 105