छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"कैसे मिलेंगे?" सदानन्द गोसावी संतप्त होकर बोले, "युवराज, आपके आदेशानुसार तीन हफ्ते तक रायगढ़ की बाहरी सीढ़ियाँ बैठे-बैठे घिस गयीं। अण्णाजी और राहुजी की टालने वाली और उपहास करने वाली नजरों को देखते देखते ऊब गया। अन्त में हिम्मत करके अण्णाजी से पूछ लिया—"पन्त सच्चाई क्या है? हमें बता दीजिए।" तब अण्णाजी ने कहा, "हमारा राजा आजकल पन्हालगढ़ पर रहता है, सज्जनगढ़ पर नहीं।" जब दुखी होकर गढ़ से उतरने लगा तो लोगों की चर्चा सुनकर बात समझ में आयी। "कैसी चर्चा ?" "लोग कह रहे थे महाराज की पहले जैसी कृपा आप पर नहीं है। इसलिए आपके द्वारा दिये गए न्याय का कोई अर्थ नहीं है। आपके आदेश का कार्यान्वयन तो दूर आपके द्वारा दिये कागज़ को हाथ लगाने का कष्ट भी अधिकारी नहीं उठाना चाहते।" बात करते-करते सदानन्द गोसावी जलती तीली को घास की गट्टी में फेंककर चले गये और आग भड़कती गयी। शम्भुराजा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उनकी आँखों में खून उतर आया। कनिष्ठ श्रेणी के कर्मचारियों को शम्भुराजा ने बैठक से बाहर जाने को कहा। किले के अधिकारी वासुदेव बालकृष्ण की ओर अपनी सन्तप्त दृष्टि घुमाई। वासुदेव बालकृष्ण हड़बड़ा गये। उन्होंने युवराज के सामने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "महाराज उस गोसावी का कहना बिलकुल झूठ नहीं था। ऊपर से आदेश दिया गया है कि युवराज द्वारा दिये गए आदेशों और निर्णयों को जहाँ तक सम्भव हो टाला जाए।" "लिखित ?" "लिखित नहीं, मौखिक।" "पन्हाला से? पिताजी का आदेश?" "वहाँ से नहीं, रायगढ़ से, राहुजी सोमनाथ और अन्य लोगों से।" "उसके ऊपर आपने क्या निर्णय लिया?" "सरकार हम आपके नौकर हैं। जब रायगढ़ से मौखिक आदेश आया तो उसके स्पष्टीकरण के लिए हमने महाराज के पास पन्हालगढ़ दूत भेजे। किन्तु चार दिन वहाँ रहने के बाद भी दूत को महाराज से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। आप ही बताएँ हम सेवक लोग इसका क्या अर्थ समझें?" शम्भुराजा उदासी से हँसे। कर्मचारियों के सामने वे कुछ बोले नहीं। किन्तु वहाँ उनका रहना अब कठिन हो गया। वे दुर्गाबाई और राणूबाई से बोले, "कर्नाटक से लौटे लगभग आठ महीने बीत गये। पिताजी हमें मिले नहीं। यहाँ सज्जनगढ़ पर 108 :: सम्भाजी