भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

भी हमें आये दो-ढाई महीने हो गये। समर्थ स्वामी का कुछ अता-पता नहीं। मुझसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है कि रायगढ़ के स्वामी ने हमें इस प्रकार झटक दिया और सज्जनगढ़ के स्वामी हमें इस प्रकार टाल रहे हैं? युवराज होते हुए भी प्रजा की शिकायत हम सुन नहीं सकते। यदि कोई फैसला दिया तो कर्मचारी सच सुनेंगे नहीं। अपने लोगों को, देश को, अपनी मिट्टी को यदि हम इतने पराये लग रहे हैं तो किसी परकीय देश में चले जाने में कौन सी बुराई होगी?'' ‘‘शम्भुराजा धीरज रखो। संकट टल जाएँगे।’’ राणूबाई ने युवराज को अपनी बाँहों में भर लिया। उन्हें शान्त करने का प्रयास करती रहीं। उसी दोपहर को माहुली के सूबेदार खेलोजी नाइक भणगे युवराज से मिलने आये। खेलोजी बाबा की उम्र सत्तर की ओर झुक रही थी। किन्तु अभी भी वे एक युवक के उत्साह से कार्य करते थे। बड़े महाराज पर उनकी बड़ी निष्ठा थी। शम्भुराजा को वे प्राणों से भी अधिक चाहते थे। खेलोजी बाबा से शम्भुराजा ने कहा, ‘‘कल बड़ा पवित्र दिन है। इसलिए कल हम पवित्र स्नान के लिए आपके माहुली क्षेत्र में आ रहे हैं। मेरे आने की सूचना किसी को भी न दें। कल प्रातः एकदम शान्त चित्त से अपने स्वराज्य में स्नान करने दें।’’ 3 दिसम्बर, 1678 भोर में ही शृंगारपुर की अश्वसेना में से चुने हुए तीन सौ सवारों का दल लेकर संभाजी माहुली क्षेत्र की ओर निकल पड़े। सवेरा होते-होते उनके घोड़े कृष्णा नदी के तट पर पहुँच गये। माहुली गाँव के पास कृष्णा और वेण्णा नदियों का संगम है। सवेरे के ठंडे वातावरण में शम्भुराजा संगम के पास खड़े थे। दोनों नदियां का पानी एक दूसरे की बाँहों में उलझ रहा था। नदी के इस पार हिन्दवी स्वराज्य अर्थात शिवाजी महाराज का प्रदेश था और दूसरी ओर बीजापुर के आदिल शाह का। उनके सतारा क्षेत्र का रहिमतपुर थाना यहाँ से अधिक दूर नहीं था। इन दोनों नदियों के किनारे बहुत पुराने पीपल और बरगद के पेड़ थे। जटाधारी बरगद तपस्या में समाधिस्थ महान सन्तों जैसे दिखाई पड़ते थे। आज पुण्य पर्व था इसलिए बहुत सवेरे से ही वहाँ संगम पर पंडितों, भिक्षुकों, यात्रियों और साधुओं की भीड़ जमा हो गयी थी। युवराज अपने प्रिय हैबती घोड़े से जैसे ही नीचे उतरे, खेलो बाबा की सफेद दाढ़ी-मूँछों में प्यार की मुस्कान बिखर गयी। शिवाजी महाराज के पुत्र का स्वागत करते हुए उनकी बूढ़ी पीठ नम्रता से और भी झुक गयी। संगम पर पूजा-पाठ आरम्भ था। किन्तु संभाजी का ध्यान उस पूजा-अर्चना की ओर रंचमात्र भी नहीं था। वे नदी के पूर्वी छोर की ओर गर्दन घुमाकर बार-बार देख रहे थे। देखते-देखते प्रभात का प्रकाश फैल गया। संगम का हरा परिसर साफ सम्भाजी 109