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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

भी हमें आये दो-ढाई महीने हो गये। समर्थ स्वामी का कुछ अता-पता नहीं। मुझसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है कि रायगढ़ के स्वामी ने हमें इस प्रकार झटक दिया और सज्जनगढ़ के स्वामी हमें इस प्रकार टाल रहे हैं? युवराज होते हुए भी प्रजा की शिकायत हम सुन नहीं सकते। यदि कोई फैसला दिया तो कर्मचारी सच सुनेंगे नहीं। अपने लोगों को, देश को, अपनी मिट्टी को यदि हम इतने पराये लग रहे हैं तो किसी परकीय देश में चले जाने में कौन सी बुराई होगी?'' ‘‘शम्भुराजा धीरज रखो। संकट टल जाएँगे।’’ राणूबाई ने युवराज को अपनी बाँहों में भर लिया। उन्हें शान्त करने का प्रयास करती रहीं। उसी दोपहर को माहुली के सूबेदार खेलोजी नाइक भणगे युवराज से मिलने आये। खेलोजी बाबा की उम्र सत्तर की ओर झुक रही थी। किन्तु अभी भी वे एक युवक के उत्साह से कार्य करते थे। बड़े महाराज पर उनकी बड़ी निष्ठा थी। शम्भुराजा को वे प्राणों से भी अधिक चाहते थे। खेलोजी बाबा से शम्भुराजा ने कहा, ‘‘कल बड़ा पवित्र दिन है। इसलिए कल हम पवित्र स्नान के लिए आपके माहुली क्षेत्र में आ रहे हैं। मेरे आने की सूचना किसी को भी न दें। कल प्रातः एकदम शान्त चित्त से अपने स्वराज्य में स्नान करने दें।’’ 3 दिसम्बर, 1678 भोर में ही शृंगारपुर की अश्वसेना में से चुने हुए तीन सौ सवारों का दल लेकर संभाजी माहुली क्षेत्र की ओर निकल पड़े। सवेरा होते-होते उनके घोड़े कृष्णा नदी के तट पर पहुँच गये। माहुली गाँव के पास कृष्णा और वेण्णा नदियों का संगम है। सवेरे के ठंडे वातावरण में शम्भुराजा संगम के पास खड़े थे। दोनों नदियां का पानी एक दूसरे की बाँहों में उलझ रहा था। नदी के इस पार हिन्दवी स्वराज्य अर्थात शिवाजी महाराज का प्रदेश था और दूसरी ओर बीजापुर के आदिल शाह का। उनके सतारा क्षेत्र का रहिमतपुर थाना यहाँ से अधिक दूर नहीं था। इन दोनों नदियों के किनारे बहुत पुराने पीपल और बरगद के पेड़ थे। जटाधारी बरगद तपस्या में समाधिस्थ महान सन्तों जैसे दिखाई पड़ते थे। आज पुण्य पर्व था इसलिए बहुत सवेरे से ही वहाँ संगम पर पंडितों, भिक्षुकों, यात्रियों और साधुओं की भीड़ जमा हो गयी थी। युवराज अपने प्रिय हैबती घोड़े से जैसे ही नीचे उतरे, खेलो बाबा की सफेद दाढ़ी-मूँछों में प्यार की मुस्कान बिखर गयी। शिवाजी महाराज के पुत्र का स्वागत करते हुए उनकी बूढ़ी पीठ नम्रता से और भी झुक गयी। संगम पर पूजा-पाठ आरम्भ था। किन्तु संभाजी का ध्यान उस पूजा-अर्चना की ओर रंचमात्र भी नहीं था। वे नदी के पूर्वी छोर की ओर गर्दन घुमाकर बार-बार देख रहे थे। देखते-देखते प्रभात का प्रकाश फैल गया। संगम का हरा परिसर साफ सम्भाजी 109

साफ दिखने लगा। घाट पर पंछियों का कलरव और भावुक भक्तों का शोर बढ़ने लगा। नदी में अनेक स्थानों पर गहरी खाई बन गयी थी। वैसे नदी में कमर के बराबर ही पानी था। अनेक भक्त इस पार से उस पार तक आ जा रहे थे। खेलोजी उनकी ओर बड़ी स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे। शम्भुराजा ने भी वहीं पर स्नान किया। नदी के उस पार के खेत से अचानक कुछ आवाज आयी। एक हरी झंडी कुछ संकेत करके अदृश्य हो गयी। इस दृश्य से खेलोजी चकित हो उठे। किन्तु वह शत्रु का क्षेत्र था, इसलिए खेलोजी ने अधिक ध्यान नहीं दिया। शम्भुराजा ने शीघ्रता से वस्त्र पहने। सिर पर जरीदार रेशमी टोप रखते ही उनका रूप निखर आया। किसी को भी बन्दी बना लेने वाली उनकी आँखें, जादू का प्रभाव डालने वाला गोरा रंग, शिवाजी महाराज जैसी ही गरुड़ सी नाक। उन्हें देखते हुए खेलोजी को लगा कि स्वयं शिवाजी महाराज ही आ गये हैं। इसी धुन में वे युवराज को देखते रह गये। इसी समय शम्भुराजा ने अपने हैवती घोड़े की लगाम खींचकर उसे संकेत किया। घोड़ा उत्साह से नाच उठा और हिनहिनाया। जिस तरह बाघ अपने अगले पैरों को उठाकर झपट्टा लगाता है, उसी तरह घोड़ा अपने अगले पैरों को उठाकर मस्ती से झूम गया। खेलोजी कुछ क्षण के लिए मुग्ध हो गये। युवराज ने नदी के किनारे से परली की ओर घोड़ा ले जाने के बदले सीधे नदी के पानी में उतार दिया। संभाजी राजा के पीछे उनके समर्थक सैनिकों ने भी अपने घोड़ों को नदी में उतार दिया। सूर्योदय के पूर्व ही नदी के उस पार मुगल सैनिकों की एक कतार बहुत पहले से ही आकर खड़ी हो गयी थी। हरे रंग के कुर्ते सलवार पहने, लम्बी लम्बी दाढ़ी-मूँछ वाले मुगल घुड़सवार शम्भुराजा को मुग्ध भाव से देख रहे थे। युवराज के नदी में उतरते ही मुगल घुड़सवारों ने अपने हरे झंडे और अपनी तलवारों को हवा में लहराया। 'अल्लाहो अकबर' और 'जय जय शम्भुमहाराज' के नारे लगाये। यह अप्रिय और अभद्र दृश्य देखकर खेलोजी का कलेजा काँप उठा। वे भी जो वस्त्र पहने थे उनके साथ ही नदी में छलाँग लगा दी। हाथ में नंगी तलवार लेकर शम्भुराजा का पीछा करते हुए वे चिल्लाये—"छोटे राजा, कहाँ चले?" शम्भुराजा ने शीघ्रता से गर्दन घुमाई और दुखी स्वर में बोले, "खेलोजी, बाबा, अब सब समाप्त हो चुका है। इसके बाद आपके और हमारे रास्ते अलग अलग हैं।" "ऐसे क्या कट्टर शत्रु की तरह बोल रहे हो, युवराज? शिवाजी महाराज का पुत्र और खान की छाया में? पूनम कैसे खड़ी होगी अमावस के साथ?" खेलोजी जी-जान से युवराज को मना रहे थे, "बस युवराज! अब इससे आगे एक कदम भी न बढ़ाओ। चुपचाप वापस आ जाओ।" 110 · सम्भाजी

शम्भूराजा ने पानी में ही घोड़े को घुमाया। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि खेलोजी के पीछे तीस चालीस मराठे पानी में उतर चुके थे। वे शम्भूराजा की ओर ही बढ़ रहे थे ! उन्हें युवराज को इस अविचारपूर्ण कार्य से पीछे लौटाना था। युवराज को भय लगा कि ये मराठे उन पर बरसेंगे और उन्हें आगे जाने से रोकेंगे। इसलिए वे म्यान से तलवार खींचकर सावधान हो गये। खेलोजी ने जान की बाजी लगाकर अपने घोड़े को आगे दौड़ाया। युवराज के समीप जाकर ये बूढ़ी हड्डियाँ आँखों में आँसू भरकर बोलीं, "नहीं युवराज ! ऐसी बात मुँह से न निकालो। आपके इस कृत्य से शिवाजी महाराज का कलेजा चूर चूर हो जाएगा।" शम्भूराजा ने घोड़े पर से कृष्णा का पानी हाथ में लिया और गरजती आवाज में बोले, "खेलो बाबा, कृष्णमाता की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, उचित समय आने पर आपको मालूम हो जाएगा कि संभाजी कौन है ? और कैसा है ? सह्याद्रि के साथ सारी दुनिया को जीतकर आपके पास प्रणाम करने के लिए आऊँगा।" यकायक कृष्णा नदी में भाग-दौड़ का खेल शुरू हो गया। 'रुकिए रुकिए' कहते हुए मगठे युवराज के पीछे दौड़ पड़े। युवराज का घोड़ा आगे न बढ़े इसलिए घेरा बनाकर पानी में गोल गोल घूमने लगे। यह देखकर कि मराठे युवराज को रोक रहे हैं, मुग़ल सैनिक पानी में कूद पड़े। मराठों के प्रयत्न का वे विरोध करने लगे। खेलोजी बहुत हठी स्वभाव के थे। शम्भूराजा ने देखा कि खेलोजी का घोड़ा उनके घोड़े की पूँछ से भिड़ रहा है। युवराज हड़बड़ा गये। तलवार से खेलोजी का सामना करना आसान था। किन्तु यदि खेलोजी ने 'शम्भू बच्चे शम्भू बच्चे' कहते हुए युवराज को गले से लगा लिया होता तो उनकी ममता के आगे युवराज की तलवार नीचे गिर जाती। उस क्षण को टालने के लिए शम्भूराजा ने सीधे किनारे की ओर अपना घोड़ा दौड़ाया। युवराज के सामने एक खड़ी चट्टान थी। यह चट्टान बहुत ऊँची थी। इसके पार जाने के लिए घोड़े को दाहिनी या बाईं ओर तिरछे होकर ले जाने की आवश्यकता थी। किन्तु उम भागा दौड़ी को टालने की धुन में युवराज ने अपना घोड़ा सीधे सामने की ओर दौड़ाया। किन्तु खड़ी चट्टान का अनुमान लगाकर घोड़ा अपनी जगह पर नाचने और हिनहिनाने लगा। युवराज ने क्रुद्ध होकर जोर से लगाम खींची और एड़ लगाई घोड़े की नाक से खून की धारा बहने लगी। किन्तु अपनी पीठ पर बैठे मालिक की जरूरत घोड़े की समझ में आयी। वह सचेत हो गया और खड़ी चट्टान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। घोड़ा भी समझ गया था कि इस खड़ी चट्टान को पार करना उसके बूते का नहीं था, फिर भी वह यह पागल प्रयत्न कर रहा था। वह बहुत प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने लगा और इस प्रयत्न में ही नीचे गिर गया। घोड़े के साथ ही युवराज की भी मृत्यु का क्षण आ गया था, किन्तु उन्होंने घोड़े के गिरने के पहले ही छलाँग लगाकर अपने को बचा लिया। सम्भाजी 111

उस कठिन प्रयास में हैबती घोड़े की हड्डियाँ टूट गयी थीं। फेफड़े के फट जाने के कारण वह अन्तिम साँस ले रहा था। उसी समय किनारे पर मुगल सैनिक 'आइए युवराज, जल्द आइए' कहकर पुकार रहे थे। पीछे की ओर खेलोबाबा की बाँहें पकड़कर कुछ मुसलमान सिपाही उन्हें रोक रहे थे। घोड़े का सीना फट जाने से बहुत खून बह रहा था। उसकी नाक से तेज आवाज आ रही थी। पैरों की छटपटाहट में उसकी वेदना की तड़प को युवराज से देखा नहीं गया। किनारे खड़ी मुगल सेना को भूलकर वे पीछे भागे और घोड़े की जीन से बँधी चमड़े की थैली में पानी भरकर घोड़े के मुँह में डालने लगे। देखते देखते घोड़े का शरीर अकड़ गया। उसने हमेशा के लिए अपनी आँखें बन्द कर लीं। युवराज एक बार फिर निश्चय करके किनारे पर खड़ी मुगल सेना की ओर चल पड़े। हरे रंग में सजी मुगल सेना की ओर चलते समय उनका कलेजा फटा जा रहा था। कुछ तो भय भी उन्हें आगे जाने से रोक रहा था। नये रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले यह कैसा अपशकुन हुआ? किन्तु जाएँगे भी कहाँ? पीछे छूट गये स्वराज्य के वे खेत, वे लोग, वे किले, वे महल भी तो उनके कहाँ थे? सामने वाले हरे दृश्य के आगे क्या रखा है? यह भी ठीक ठीक ज्ञात नहीं था। किन्तु क्या वीरता ही मनुष्य का सच्चा आभूषण नहीं है? युवराज सोचते हैं—'अपने दादाजी शाहजी महाराज आदिलशाह के दरबार में नौकरी करते थे। तब पिताजी ने आदिल शाही के विरुद्ध बगावत नहीं की थी क्या? आज स्वराज्य की अविश्वास और अन्याय की खाई में सड़कर मरने की बजाय परदेश में प्रयत्न करेंगे, पराक्रम करेंगे, यश की माला पहनेंगे और फिर से पिताजी का मंगल आशीर्वाद लेने के लिए स्वराज्य में वापस आ जाएँगे। यह सब करने के लिए दिलेरखान नामक सोने की मछली के मुँह में बहादुरी से छलाँग के अतिरिक्त अपने हाथ में बचा ही क्या है?' पाँच सह्याद्रि का बछड़ा मुगलाई के जंगल को रौंदता हुआ तेजी से बढ़ा जा रहा था। उसके साथ चलने वाली मुगल सेना की टुकड़ी हुड़दंग मचाती हुई चल रही थी। यह घटना ही मुगलों के लिए विलक्षण थी। मराठों का युवराज बिना प्रयत्न के ही मुगलों के काँटे में फँस रहा था। इस खबर को सुनते ही दिल्ली के औरंगजेब से लेकर दक्षिण के दिलेरखान तक सभी अमीर उमराव प्रसन्न होने वाले थे। 112 :: सम्भाजी

जैसे-जैसे अपना प्रदेश पीछे छूटने लगा वैसे-वैसे शम्भूराजा के मन में घबराहट होने लगी। जलती हुई आग से बचने के लिए जब कोई आदमी बाहर निकलता है तो भी अंगारों के कण चटककर उसे क्रूरतापूर्वक जलाते हैं। ऐसी ही मानसिक अवस्था शम्भूराजा की हो रही थी। उनके इस कृत्य में बहादुरी से अधिक धोखा था। वाठार गाँव के पास दिलेरखान का सूबेदार एखलासखान और उसका भतीजा गैरत तीन हजार की सेना लेकर खड़े युवराज की राह देख रहे थे। उन दोनों ने युवराज का स्वागत किया। दिलेरखान द्वारा दी गयी हिदायतों के अनुकूल सब कुछ हो रहा था। सालपा घाट पीछे छूट गया। नीरा नदी भी पीछे गयी। कुरकुंभ गाँव के पास सजाये गये शामियाने के पास दिलेरखान पागल की भाँति इधर-उधर घूम रहा था। उसने जान बूझकर युवराज के स्वागत के लिए एखलास को आगे भेजा था। उसका मराठा जाति पर बिलकुल विश्वास नहीं था। उसे शंका थी कि कहीं शिवाजी और संभाजी बाप बेटे ने कोई षड्यन्त्र न रचा हो? इसी आशंका से उसका मन सम्भ्रमित हो रहा था। दिलेरखान बीच बीच में गद्गद होकर हँसता भी था। क्योंकि एक घंटा पहले दो घुड़सवार यह खुशखबरी लेकर शामियाने में पहुँचे थे 'कि शिवाजी का बेटा अपनी सेना में आ गया है।' उन दूतों के इस सन्देश पर दिलेरखान को क्षणभर के लिए विश्वास ही नहीं हुआ। पुरन्दर के जानलेवा घेरे में जब दिलेरखान ने मुरारबाजी देशपांडे की गर्दन काटी थी और खून से लथपथ हाथों को अपने किनखाफी कुर्ते से पोंछा था तब भी उस आसुरी आनन्द में आज जितनी खुशी नहीं मिली थी। अचानक दिलेरखान की दृष्टि दो-तीन कोस के मैदान की ओर गयी। आसमान में धूल के बादल उड़ाते हुए पागल घोड़े मस्ती से दौड़ रहे थे। कुछ समय में ही सेना दिलेरखान की दृष्टि सीमा में आ गयी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने अपनी आँखों से आनन्द के आँसू पोंछे। सामने देखता है तो सिर से पाँव तक सजाये गये हाथी हौदे में एखलासखान के साथ संभाजी राजा रोब से बैठे थे। शिवाजी महाराज और संभाजी की मुखाकृति में पर्याप्त समानता थी। दिलेरखान उस हौदे को टकटकी लगाए पागल की तरह देखता रहा। परिचारकों का दल आगे दौड़ा। उन्होंने हाथी से उतरने के लिए सीढ़ी खड़ी की। किन्तु दिलेरखान, स्वयं ही, सीढ़ियों से चढ़कर तेजी से ऊपर गया। "आइए दक्खिन की शान! शेर संभाजी महाराज आइए।" ऐसा कहते हुए उसने वहीं पर संभाजी को बाँहों में भर लिया। हज की यात्रा में जैसे छूटा हुआ कोई छोटा भाई दस-बीस वर्ष बाद वापस आ गया हो। उसके आने की जैसी खुशी होती सम्भाजी :: 113

है। वैसी ही खुशी दिलेरखान को हो रही थी। वह सोच नहीं पा रहा था कि शम्भुराजा को कहाँ रखे और कैसे रखे ? दोपहरी के एकान्त में दोनों की बातें चल रही थीं। यहाँ तक आये हुए मराठों के स्वाभिमानी युवराज को अपनी किसी मूर्खता से नाराज न करके, प्यार का गलीचा फैलाकर अपने क्षेत्र में ले जाने के लिए बहुत सावधानी से कार्य कर रहा था। वह युवराज को उत्तेजित करते हुए बोला, “युवराज, इसके आगे की आपकी जिन्दगी में आनन्द-ही-आनन्द है। शहजादे, अब किसी बात की फिक्र न करना। आपकी नाराजगी और रायगढ़ के बेढंगेपन की पूरी खबर है आपके इस भाईजान को।” शम्भुराजा चुप थे। दिलेरखान ने विश्वास का हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन शहजादे, ममता से अन्धे होकर अपनी सियासती का मजहब भूलने का पाप मत करो। अपनी हुकूमत सँभालने के लिए माँ बाप यार दोस्त मेहमान आदि को अपने कब्जे में रखना पड़ता है। कल आपकी सौतेली माँ सोयरारानी अपने बेटे के लिए ही राज्य माँगने वाली है। उनकी इच्छा के सामने आपके अब्बाजान शिवाजी शरणार्थी बन जाएँगे। अपने पुराणों को पढ़ो, इतिहास को पढ़ो। रावण ने अपने भाई जान के साथ जंग किया, कुश, लव ने राम के साथ, धर्मराज ने अपने मामा शकुनी के साथ—इतना ही नहीं खुद औरंगजेब ने भी अपने बूढ़े बाप के साथ जंग किया था। जंग किये बिना फतेह नहीं फतेह के बिना कीर्ति नहीं।” दिलेरखान को अभी बहुत भाग दौड़ करनी थी। शम्भुराजा को मालूम हुआ कि कुरकुम्भ में उनका जो स्वागत हुआ था उससे कहीं अधिक भव्य और शानदार स्वागत की तैयारी बहादुरगढ़ पर आरम्भ हो गयी थी। बहादुरगढ़ का नाम सुनते ही संभाजी राजा का गला सूख गया। उनके तनाव भरे चेहरे के पीछे क्या कारण था ? यह दिलेरखान की समझ में भी नहीं आ रहा था। मुगलों की फौज आगे बढ़ रही थी। सह्याद्रि की श्रेणियों की कतारें पीछे छूट गयीं। भीमा नदी के किनारे का हरा भरा प्रदेश दिखाई दे रहा था। दक्खिन प्रदेश की जिम्मेदारी औरंगजेब ने इससे पहले अपने दूधभाई बहादुरखान कोकलताश जाफरजंग पर सौंपी थी। उसी ने भीमा नदी के किनारे पेड़गाँव के पास एक बहुत बड़ा किला बनवाया था। बहादुरखान कोकलताश ने अपने ही नाम पर किले का नाम बहादुरगढ़ रखा था। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद रायगढ़ के महल में पहली बार बहादुरगढ़ का नाम संभाजी ने सुना था। इस किले पर उत्तम नस्ल वाले एक सौ कीमती अरबी घोड़ों के साथ एक करोड़ रुपये की राशि पहुँचा दी गयी है। यह समाचार सुनकर शिवाजी महाराज सावधान हो गये थे। एक दिन अचानक लिंपण गाँव की पश्चिम दिशा से दो हजार मराठा सैनिकों के बहादुरगढ़ की ओर लुके-छिपे आने की खबर पाकर बहादुर कोकलताश बहुत 114 :: सम्भाजी

प्रसन्न हो गया। उसने पश्चिमी दरवाजे पर पहरेदारों को जानबूझकर असावधान रहने का आदेश दिया और बड़ी चालाकी से दो हजार मराठा सैनिकों को अन्दर ले लिया। किन्तु जब मराठा सैनिकों ने किले में खड़े हजारों सैनिकों को पहरा देते हुए देखा तो वे डर गये। डरी हुई मराठा फौज भैरोबा की ओर से बाहर भागने लगी। बहादुर खान खुशी से पागल हो गया । उसके सभी सैनिक मराठा सैनिकों पर जानलेवा हमला करके पीछा करने लगे। अब बहादुर एकाकी और उदास दिखने लगा था। किले में रहने वाली महिलाओं खानसामों, बच्चों, पानी भरने वालों और मामूली नौकरों चाकरों के अतिरिक्त कोई नहीं रह गया था। यहाँ तक कि किले के बाहर दरवाजों को बन्द करने के लिए भी कोई सैनिक पीछे नहीं छूटा था। इसी समय दूर काष्टी की ओर से घने पेड़ों और नदी नालों में छुपी बैठी सात हजार सैनिकों की खास मराठा फौज सामने आ गयी। किले पर उनका कहीं भी विरोध या प्रतिरोध नहीं हुआ। दो सौ अरबी घोड़ों को लेकर मराठे बड़ी आसानी से निकल गये। जाते जाते जिस प्रकार अपने द्वारा मारे गये हिरन बाघ पीठ पर लादकर ले जाता है उसी प्रकार मराठे एक करोड़ रुपयों का खजाना भी अपने साथ लेते गये। शक्तिमान शिवाजी महाराज ने शक्तिशाली मुगलों को एक बार फिर उनकी औकात बता दी थी। आज शम्भुराजा भयानक दबाव में थे। वे बार-बार सोचते थे—'हम स्वराज्य का नाम रोशन करने के लिए निकले हैं या डुबोने के लिए?' दूरी पर बहादुरगढ़ की आड़ी तिरछी आकृति दिखने लगी। दाहिनी ओर भीमा नदी का विशाल विस्तार दिख रहा था। शम्भुराजा के स्वागत के लिए शहनाई ढोल, तासे आदि मंगलवाद्य बज रहे थे। हाथी के ऊपर हौदे में युवराज के साथ दिलेरखान बैठा था। किले के अन्दर मुगलों ने एक जीती जागती सुन्दर और समृद्ध नगरी बसायी थी। नगर में घरों के शीर्ष पर और बुर्ज के शिखर पर औरंगजेब की हरी झंडियाँ फहरा रही थीं। बहादुरगढ़ का किला मुगलों के अहंकार का प्रतीक था। इसकी पत्थर की दीवारें मजबूत और बुर्ज शानदार थे। यह दक्षिण की मिट्टी को पेड़ की पत्तियों की तरह नगण्य मानता था। इसके पहले बहादुरगढ़ के रहने वालों ने दक्खिन के सरदारों को सिर नीचा किये, हीरे मोती से भरी थालियों को हाथ में लिये दरवाजे के भीतर आते देखा था। अनेक दक्खिनी अमीर उमरावों का स्वागत चाबुक से किया गया था। परन्तु आज पहली बार दक्खिन के एक सुन्दर और रोबीले राजकुमार को हाथी पर बिठाया गया था। उसके लिए शानदार जुलूस निकाला गया था। अलिन्दों पर, छतों पर, और गली गली में एकत्र हुई महिलाओं और बच्चों की भीड़ शिवाजी महाराज के पुत्र को बड़े ध्यान से देख रही थी। आज के जुलूस में उत्साह का जलवा था। बहुत सज-धज थी। किन्तु अकारण ही शम्भुराजा को किसी चीज के जलने की दुर्गन्ध आ रही थी। सम्भाजी :: 115

युवराज का मुँह सूख गया। चमड़े की थैली को मुँह से लगाकर जल्दी जल्दी पानी पीने लगे। किन्तु उनकी प्यास बुझ नहीं रही थी। भीमा नदी के किनारे का वह किला अनुमानतः छः सौ एकड़ जमीन पर फैला हुआ था। भीतरी प्राचीर के अन्दर मुगल नगरी बसी थी। बाहर की प्राचीर पूर्व की ओर लगभग डेढ़ कोस तक फैली थी। उसने भीमा से मिलने वाली छोटी नदी सरस्वती को भी अपने भीतर समेट लिया था। रायगढ़ या राजगढ़ जैसे पहाड़ी किलों में ही युवराज को रहने की आदत थी। जिससे बहादुरगढ़ की आयताकार हवेलियाँ बड़े-बड़े महल ऊँचे ऊँचे मन्दिरों और मस्जिदों की चोटियाँ देखकर शम्भूराजा को बचपन में देखा गया आगरा शहर याद आ रहा था। बहादुरगढ़ पर साठ-सत्तर हजार रैयत और सैनिकों का निवास था। वहाँ पर अरबी, ईरानी, खोजा, मुगल, दक्खिनी मुसलमान मराठा सैनिक, हुकूमत करने वाले उत्तर के मुगल, कुनबी, कारीगर, मिस्त्री पानी भरने वाले विविध जमातों और वर्णों के लोगों की भीड़ जमा थी। किले के बीचोंबीच कुछ ऊँची जगह पर बहादुर खान ने एक चार बरामदे वाला बड़ा महल बनवाया था। उस सागौन और शीशम के महल में दीवारें और पर्दे नहीं थे। इसलिए वहाँ आमसभा में बैठे राज्य कर्मचारियों और प्रजा को भीमा नदी के प्रवाह का दर्शन होता था। दिलेरखान के साथ शम्भूराजा जब उस महल में प्रवेश कर रहे थे तब वहाँ दीवाली जैसी रोशनी की गयी थी। मुहल्लों और गलियों में पटाखे और अनार फूट रहे थे। किनारों पर भव्य दीप ज्योति जल रही थी। जलते दीपों की ज्योति भीमा के शान्त प्रवाह में झिलमिला रही थी। यह सारी रोशनी खिलखिलाकर हँसते हुए बगल के अँधेरे से कह रही थी—“शिवाजी का पुत्र संभाजी मुगलों से मिल.गया।‘’ समारोह में शम्भूराजा की बहादुरी के गीत गाये जा रहे थे। उन्हें महँगे वस्त्र और रत्नमालाएँ अर्पित की जा रही थीं। चारों ओर बैठे दरबारियों और सरदारों पर युवराज की नजर घूम रही थी। इसी बीच शम्भूराजा के ठीक सामने बैठे एक लम्बा पतला उमराव युवगज को टकटकी लगाए देख रहा था। युवराज का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट हुआ। उस आदमी की दाढ़ी मुगलों जैसी थी। बहुत दिनों तक पराये प्रदेश में रहने के कारण उसका पहनावा, ठाट-बाट, सिर की पगड़ी आदि पक्के मुसलमान जैसा था किन्तु वह वास्तव में एक मराठा था। शम्भूराजा ने उससे आँख मिलाई तो उसके चेहरे पर घृणा का भाव आ गया और क्रोध से उसने अपनी आँखें दूसरी ओर घुमा लीं! बहुत दिनों के बाद मिलने वाला वह मराठा उमराव बजाजी नाइक का पुत्र महादजी था। इसी के साथ युवराज की बड़ी बहन सखुबाई का विवाह हुआ था। आज शत्रु के शिविर में शिवपुत्र का बड़ा सम्मान हो रहा था। कि शिवाजी महाराज द्वारा बहादुरगढ़ के गाल पर जड़ी गयी दूसरी जोरदार थप्पड़ को बहादुरगढ़ 116 :: सम्भाजी

अभी भूल नहीं पाया था। शिवाजी महाराज जब कर्नाटक की बड़ी लड़ाई के लिए निकल रहे थे तो अपनी अनुपस्थिति में उन्हें आशंका थी कि अनुपस्थिति का लाभ उठाकर दक्षिण में नियुक्त मुगल सूबेदार बहादुरखान जाफरजंग आक्रमण कर सकता था। इसीलिए उन्होंने खान के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था। उन्होंने कहा था, “हिन्दवी स्वराज के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण किले बादशाह औरंगजेब को बिना शर्त भेंट करके स्वयं शरणार्थी बन जाएँगे क्योंकि इस उम्र में केवल शान्ति चाहिए।” इस प्रकार का प्रस्ताव लेकर मराठा दूत जब-जब बहादुरखान के पास पहुँचे तो उन्हें बिना सोंठ खाये ही खाँसी चले जाने जैसा समाधान मिला। काबुल, कंधार, अफगानिस्तान के साथ नित्य झगड़े से संत्रस्त औरंगजेब के मन को यह प्रस्ताव बहुत बड़ी विजय जैसा सुखद लगा। प्रसन्नतापूर्ण वातावरण में सारी बातें निश्चित हो गयीं। इस सन्धिपत्र को व्यावहारिक रूप देने के लिए शिवाजी महाराज ने केवल एक शर्त रखी थी। उन्हें सन्धिपत्र पर बादशाह औरंगजेब के हाथ के पंजे का निशान चाहिए था। बहादुर खान ने हँसते-हँसते इस शर्त को स्वीकार कर लिया। पंजे का निशान लेने के लिए कागज दिल्ली रवाना किया गया। कागज लौटने पर ही सब कुछ निश्चित होना था। उस आनन्द की बेहोशी में खान शिवाजी महाराज को उपहार के रूप में देने के लिए एक उत्तम हाथी और एक चन्दन की पालकी तैयार रखी थी। सन्धि की शर्तों और पंजे के निशान आदि एकत्र करने में कुछ महीने बीत गये। इसी बीच शिवाजी महाराज ने कर्नाटक की लड़ाई जीत ली। वहाँ से वापस आने पर खान के दूत जब सन्धिपत्र लेकर शिवाजी महाराज के पास पहुँचे तो शिवाजी महाराज ने सन्धिपत्र को फेंक दिया। बहादुर खान एकबार पुनः धोखा खा गया। औरंगजेब उस पर इतना क्रुद्ध हुआ कि दक्षिण की सूबेदारी उसे खोनी पड़ी। समारोह के बीच ही दिलेरखान ने बगल की ओर उँगली से इशारा किया। उसी ओर एक ऊँचा सजा-सजाया हाथी झूम रहा था। उसी की ओर संकेत करते हुए दिलेरखान ने कहा, “शहजादे, डेढ़-दो वर्ष पहले मराठों को भेंट करने के लिए बहादुर खान साहब ने यही हाथी तैयार कर रखा था। वही हाथी आज हम आप को भेंट करते हैं।” विशिष्ट लोगों की ओर हाथ उठाकर दिलेरखान ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, “शम्भूराजा के लिए हमने शाही लिबास सोने और हीरे जवाहरात के गहने मँगवाये हैं। हम चाहते हैं कि यह सारा उपहार हमारी ओर से युवराज के बहनोई महादजी नाइक निम्बालकर उन्हें भेंट करें।” अगल-बगल खचाखच भरी भीड़ ने जोर से तालियाँ बजाकर दिलेरखान के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कुछ असन्तुष्ट और नाखुश चेहरा बनाकर महादजी नाइक उठकर खड़े हो गये। किन्तु उठते-उठते उनकी पीठ में जोर की मोच आ सम्भाजी :: 117

गयी और वे अपना चेहरा टेढ़ा करके अपनी जगह पर बैठ गये। तब दिलेरखान ने स्वयं वस्त्र, उपहार और राजा की पदवी देकर युवराज को सम्मानित किया। समारोह की समाप्ति पर दिलेरखान के साथ अन्य बहुत से लोगों ने युवराज से हाथी पर बैठने का आग्रह किया। किन्तु संभाजी राजा ने यह आग्रह स्वीकार नहीं किया वे अपने हवेली तक पैदल चलकर आये। दिलेरखान ने किले के अन्दर ही युवराज के ठहरने की व्यवस्था की थी। महादजी नाइक का निवास भी बगल के महल में था। अपने बहनोई का हाल-चाल जानने के लिए युवराज स्वयं जाकर उनके सामने खड़े हो गये। सामने बिछौने पर बैठे महादजी अपनी जगह से जग भी नहीं हिले। उन्होंने शम्भुराजा का तनिक भी सम्मान नहीं किया। अन्ततः युवराज ही उनसे बोले, "दाजी, कैसी है आपकी तबीयत?" "ठीक है।" महादजी ने क्रुद्ध स्वर में कहा। "झूठी मोच का बहाना करने से दर्द होगा भी कैसे?" महादजी ने क्रोध से संभाजी राजा की ओर देखा। बगल में थूकते हुए उन्होंने उल्टा प्रश्न किया— "शिवाजी महाराज को छोड़कर तू यहाँ क्यों आया संभा? क्या जरूरत थी यहाँ आने की?" "अपने बहनोई की तरह दूसरे का गुलाम बनने के लिए सोचकर।" "बिला वजह जले पर नमक न छिड़को संभा। मेरे जैसे मराठों की कितनी पीढ़ियाँ दूसरों की गुलाम बनती आयी हैं। किन्तु तुम बाप बेटों ने हिन्दवी स्वराज्य का जो संकल्प लिया है, वह तो पूरा करो।" महादजी के कठोर शब्दों ने युवराज के कलेजे के टुकड़े टुकड़े कर दिये। उनके चेहरे पर से दरबार की कान्ति गायब हो गयी। वैभव से परिपूर्ण उस नगरी में शम्भुराजा असीम उदासी और अकेलेपन का अनुभव करने लगे। दो दिन में ही रहिमतपुर से लम्बी यात्रा करके शाही पालकियाँ बहादुरगढ़ पर आ पहुँचीं। सज्जनगढ़ से निकलते समय युवराज को आशंका थी कि मुगलों के राज्य की ओर जाने में सम्भवतः उनका पीछा किया जाएगा। यह भी सम्भव था कि तलवारें निकलतीं और लड़ाई होती। इसीलिए शम्भुराजा ने दुर्गाबाई को अपने साथ नहीं लिया था। उन्हें समीप के मुगल थाने पर अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ भेज दिया था। वहाँ के थानेदार ने ही उन्हें सकुशल बहादुरगढ़ पहुँचाया था। किन्तु दुर्गाबाई के साथ राणूबाई को देखकर शम्भुराजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने चिन्तित होकर पूछा— "यह क्या कर बैठी दीदी? वाई में घर गृहस्थी, बाल-बच्चे, घर-बार, नाते-रिश्ते छोड़कर यहाँ किसलिए आ गयी?" "जाने दो शम्भू! तुम्हें कभी माँ की स्नेह छाया तो मिली नहीं। जीजा माता भी नहीं रहीं। पिताजी ने भी तुम्हारी ओर से मुख मोड़ लिया। तुम्हें माया-ममता देने वाला घर का कोई व्यक्ति तुम्हारे साथ होना चाहिए न?" 118 :: सम्भाजी

दीदी की इस बात को सुनकर युवराज कुछ न कह सके। दिलेरखान ने युवराज के लिए सुन्दर ऊँची हवेली, अच्छे नौकर चाकर और धन सम्पदा की व्यवस्था कर रखी थी। शम्भुराजा की हवेली के पीछे एक नीची दीवारों वाला घर था। पुराने दिखने वाले, पत्थरों से बने मजबूत घर में किसी राजनीतिक कैदी को बन्द करके रखा गया था। अपनी हवेली से कभी रात में तो कभी दिन में शम्भुराजा की नजर उस रहस्यमय घर की ओर पड़ती थी। उस घर के दरवाजे के खुलने की आवाज न तो युवराज ने सुनी और न ही दुर्गाबाई ने। उस राजनीतिक कैदी की अवस्था किसी बड़े पिंजड़े में बन्द पशु जैसी थी। उस कैदी के लिए दिन में दो बार खिड़की से खाना फेंका जाता था। कभी दिन के धुँधले प्रकाश में तो कभी रात में मोमबत्ती के हल्के प्रकाश में उस राजनैतिक कैदी का चेहरा दिख जाता था। लगभग साठ वर्ष का, साधारण कद काठी का, बोलती आँखों वाला वह एक मुसलमान बूढ़ा था। साधारण कैदी की तरह किसी अँधेरी कोठरी में फेंक देने के बदले उसे राजनीतिक कैदी बनाकर उसे इस खास घर में रखा गया था। थोड़े दिनों में शम्भुराजा को सूचना मिली कि उस बन्दी का नाम मियाँखान है और वह अथणी का सूबेदार था। दो महीने बीत गये फिर भी दिलेरखान की आगे की चाल समझ में नहीं आ रही थी। शत्रु के शिविर में शम्भुराजा का दम घुटता था। बहादुरगढ़ की ज़ालिम हवेली में उन्हें किसी प्रकार नींद नहीं आती थी। माता भवानी के नाम का गले में बँधा ताबीज वे बार-बार अपनी आँखों पर रखते थे। अपनी जन्मभूमि की, प्रदेश की, अपने प्रिय पिता की बहुत याद आती थी। उनकी आँखों के सामने येसूबाई की प्रेरक पुतलियाँ बार बार दिखती थीं। युवराज का सन्ताप और मन्त्रस्त भाव की बेचैनी देखकर दुर्गाबाई और गणूबाई की जान और भी संकट में पड़ी थी। वे युवराज से भी अधिक जागरण करती थीं। अपने पति को मानसिक और भावनात्मक शान्ति देने के लिए दुर्गाबाई हर सम्भव प्रयास करती थीं। एक रात एक भयानक स्वप्न ने युवराज के हृदय को विदीर्ण कर दिया। वे अचानक जगे और भयभीत होकर बिस्तर पर बैठ गये। आसपास के नीम के पेड़ हवा से सनसना रहे थे। दुर्गाबाई भी डरकर उठी और युवराज का मुँह देखने लगीं। शम्भुराजा की आँखों के सामने से भीषण सपना हट नहीं रहा था। दिलेरखान द्वारा भेंट किया गया सजा सजाया हाथी पागल हो गया था। उसके खम्भे जैसे पैर शम्भुराजा के शरीर के चिथड़े चिथड़े कर रहे थे। युवराज का पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया था। सम्भाजी 119

अजगर की चपेट में एक बहादुरगढ़ की फौलादी प्राचीरों को तोड़कर मराठी ढंग के गहने बेचने के बहाने एक सुनार किले में दाखिल हो गया। वह महाड़ पोलादपुर की ओर का रहने वाला था। वह जबान का मीठा और वार्तालाप में चतुर था। इसी कारण या किसी और कारण से उसने दुर्गाबाई को बहुत से गहने खरीदने के लिए विवश किया। वहीं बरामदे में शम्भुराजा को आते देखकर उस सुनार ने धीरे से लाखों के मूल्य की खबर सुनायी— ‘‘छोटे मालिक आप पर देवी की कृपा हो गयी है। लक्ष्मी घर आयी है। बच्ची और बच्ची की माँ दोनों श्रृंगारपुर में स्वस्थ और सुरक्षित हैं।‘‘ इस खबर को सुनकर शम्भुराजा का हृदय ममता से भर आया। उन्होंने अपने गले का हार निकालकर उस जासूस को भेंट कर दिया। अपनी पहली बच्ची के जन्म के समय मुझे श्रृंगारपुर में उपस्थित रहना चाहिए था। शम्भुराजा सोच रहे थे कि वहाँ यदि होता तो हाथी पर बैठकर जलेबियाँ बाँटता। राजकन्या की प्राप्ति की कल्पना मात्र से उनके रोंगटे खड़े हो गये। अपने महल में से—विशेष रूप से महल की पिछली खिड़की से शम्भुराजा की दृष्टि उस काले रहस्यमय घर की ओर अनेक बार जाती थी। उन्हें वहाँ बीच बीच में मियाँखान दिखाई पड़ जाते थे। अथड़ी के उस आदिलशाही सूबेदार के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी शम्भुराजा को प्राप्त हो चुकी थी। मियाँखान आदिलशाही की सेवा में होते हुए भी उसकी और उसके परिवार की निष्ठा मुगल बादशाह के प्रति ही थी। मियाँखान दक्षिण की खबरें औरंगजेब तक पहुँचाने और मुगलों के हित की रक्षा करने का कार्य करता था। किन्तु मौके का लाभ उठाकर उसके शत्रुओं ने मियाँखान की शिकायत औरंगजेब से कर दी। आलमगीर स्वभाव से ही शक्की था। उसके लिए इतना मौका काफी था। उसने अथणी के लिए फौज भेजी। सिपाहियों ने मियाँखान को कैद करके बहादुरगढ़ पर खींच कर पहुँचाया। 120 :: सम्भाजी

धीरे-धीरे हर बात शम्भूराजा की समझ में आने लगी। मराठी राज्य का युवराज होने के नाते शम्भूराजा को किले में घूमने की चाहे जितनी छूट रही हो, किन्तु उनके महल के आसपास रात-बिरात धीमे-पाँव से गश्त लगाने वाली टोलियाँ घूमती रहती थीं। युवराज पर हमेशा निगरानी रखी जाती थी। यदि वे कभी भीमा नदी की विशाल धारा के किनारे घूमने जाते तो वहाँ भी उन पर निगाह रखी जाती। एक दिन शम्भूराजा ने इन स्थितियों से ऊबकर दिलेरखान से क्रोध के आवेश में प्रश्न किया- "खान साहब हम आपके मेहमान हैं या कैदी?" दिलेरखान का उनके बारे में क्या विचार है? यह शम्भूराजा की समझ में नहीं आ रहा था। इससे वे बहुत बेचैन हो रहे थे। युवराज के रूप में इतना बड़ा मोहरा हाथ लग जाने की खबर दिलेरखान ने तत्काल दिल्ली भेज दी थी। किन्तु औरंगजेब सहज ही उस पर विश्वास करने वाला नहीं था। उसने अपने विश्वस्त लोगों द्वारा इसकी जाँच कराने का निश्चय किया। उसके लिए यह पता लगाना जरूरी था कि जो युवक शिवाजी का बेटा बनकर मुगल फौज में आया था वह सचमुच शिवाजी का पुत्र था या कोई बनावटी युवराज था। दिल्ली दरबार युवराज के विषय में क्या निर्णय करेगा? यह दिलेरखान के लिए स्पष्ट नहीं था इसलिए दिलेरखान के मन की बात शम्भूराजा को भी स्पष्ट नहीं हो रही थी। शम्भूराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्हें न दिन को चैन था न रात को नींद। एक रात को उन्होंने पिछवाड़े की खिड़की से उस रहस्यमय घर में मोमबत्ती का प्रकाश देखा। खिड़की के पास मियाँखान आकर बैठा था। किसी असह्य दुख से वह व्याकुल हो रहा था। उसकी आँखों से धारासार आँसू बह रहे थे। दुख की तीव्रता के कारण उसकी नाक का अग्रभाग लाल हो गया था। लगता था वह स्वयं पर क्रुद्ध हो रहा है। असहाय होकर खिड़की की सलाखों पर सर पटकता था। दूसरे दिन दुर्गाबाई ने भी वही दृश्य देखा। शम्भूराजा का ध्यान आकर्षित करते हुए वे बोलीं, "पता नहीं किस दुःख से वह बेचारा तड़प रहा है? कल से देख रही हूँ, उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अगली रात में भी शम्भूराजा ने वही दृश्य देखा। मियाँखान ऐसे तड़प रहा था जैसे किसी ने छोटी मछली को तपते तवे पर रख दिया हो। उसे देखकर शम्भूराजा ने दुर्गाबाई से कहा, "आप सवेरे भैरोंबाबा का दर्शन करने पिछवाड़े के दरवाजे से ही जाती हो न?" "हाँ, क्यों?" दुर्गाबाई का प्रश्न। "कल सवेग होने से पहले ही दर्शन करने जाओ और जाते-जाते स्वयं ही उसके दुख का कारण पूछ लो। किन्तु यह बात नौकर चाकरों के हाथ नहीं लगनी चाहिए। इसलिए आप स्वयं...।" सम्भाजी :: 121

भोर होने से बहुत पहले ही दुर्गाबाई अपनी दो विश्वस्त दासियों को साथ लेकर महल से बाहर निकलीं। सूरज की पहली किरण निकलने के पहले ही वे भैरोंबाबा का दर्शन करके वापस भी लौट आयीं। सीढ़ियों पर शम्भूराजा उनकी प्रतीक्षा में खड़े थे। दुर्गाबाई वहाँ आयीं और भावुक होकर कहने लगीं— "बेचारा बहुत भला आदमी दिखता है। औरंगजेब द्वारा फँसाये जाने का दुख तो उसे है ही किन्तु इस समय वह एक दूसरी ही घरेलू समस्या से पागल हो रहा है।" "क्या ? हुआ क्या है ?" "उसकी बेगम बच्चों को जन्म देते ही मर गयी। उसने दो बच्चियों को जन्म दिया था। उन बच्चियों को पालने पोसने में मियाँखान ने अपनी उम्र गँवाई। छ महीने पहले बीजापुर के एक जमींदार के दो बेटों के साथ इन जुड़वाँ बहनों का विवाह निश्चित हो चुका है। चार दिनों के बाद विवाह की तिथि है।" "फिर ?" "मियाँखान ने अपने दामादों के लिए दहेज की बहुत बड़ी रकम कबूल की थी। उन बेटियों की माँ नहीं है और बाप ऐन मौके पर कैदखाने में बन्द हो गया। वह महसूस कर रहा है कि घर के नौकर चाकरों से विवाह का कार्य ठीक ठीक नहीं हो पाएगा। शादी टूट भी सकती है। दुर्भाग्य से इसकी गलती लड़कियों के माथे पर ही आएगी। दुनिया समझेगी कि लड़कियों में ही कुछ खोट है। लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। यही समस्या इस अभागे बाप को पागल बना रही है।" उसकी दर्दभरी कहानी सुनकर शम्भूराजा का मन पिघल गया। उसी दिन वे हवेली की छत पर से इधर उधर देख रहे थे। वे यह सोचकर अधीर हो रहे थे कि अभी तक अँधेरा होते ही शम्भूराजा की उस हवेली में अनेक हलचलें उग आयीं। उन्होंने रसोईघर में काम करने वाले जैमुद्दीन को बुला लिया। युवराज उस मोटे थुलथुल दाढ़ी वाले बुड्ढे जैमुद्दीन को प्रसन्नतापूर्वक देखते ही रह गये। शम्भूराजा ने रात के अँधेरे में अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ जैमुद्दीन को उस रहस्यमय घर की ओर भेज दिया। स्वयं शम्भूराजा हवेली के दरवाजे पर आकर पटाखे फोड़ने लगे। उनके नौकर-चाकर भी चन्द्र ज्योति और उत्सव का आनन्द लेने लगे। आसपास सभी जगह हलचल मच गयी। शम्भूराजा के कुछ सेवक वहाँ पर एकत्र लोगों को जलेबियाँ बाँटने लगे। हवेली के सामने पटाखों की आतिशबाजी चल रही थी। उसे देखने के लिए आसपास के सभी पहरेदार जमा हो गये। उसी समय पिछवाड़े के 122 सम्भाजी

रहस्यमय घर का दरवाजा लोहे की रिंच से ढीला किया जा रहा था और अब शम्भुराजा का विश्वस्त खानसामा जैमुद्दीन उस राजबन्दी की जगह पर खिड़की- दरवाजे बन्द करके बड़े मजे से अन्दर बैठा था। आधी रात बीत गयी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। इसी समय हवेली के तहखाने में छुपा हुआ मियाँखान शम्भुराजा के सामने आया। उसने दौड़कर शम्भुराजा के पैर पकड़ लिए। वह विह्वल होकर बोला, "बेटे, मेरी पुकार सुनकर आप के रूप में अल्लाह ही आ गया। " "इसमें इतनी क्या बात है मियाँखान? अब तो मैं भी एक बेटी का पिता बन गया हूँ। इसलिए बेटी के बाप की पीड़ा...।" "शम्भू महाराज आपके इस उपकार को जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा।" शम्भुराजा ने अपने सेवक को पहले से ही बुला रखा था। उसने कुछ ही क्षणों में मियाँखान के चेहरे का भार उतार दिया। बूढ़े सिंह की तरह दिखने वाले मियाँखान लल्लू जैसे विदूषक जैसा दिखने लगा। मियाँखान शम्भुराजा के सिपाहियों के साथ सीमा के बाहर जाने वाला था। "खान साहब! वापस कब आओगे?" "पाँचवीं रात खत्म होने से पहले ही अपने कैदखाने में वापस आ जाऊँगा।" शम्भुराजा कुछ बोलने को तत्पर हुए। एक लम्बी साँस छोड़ करके बोले, "मियाँखान ! बेटी के अभागे बाप के आँसू - उन आँसुओं का विश्वास करके ही हम यह जोखिम उठा रहे हैं। इसमें यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई तो एक राजबन्दी बिना किसी अधिकार के मुक्त कराने का इल्जाम मुझ पर लगाया जाएगा।" शम्भुराजा के ऐसा कहने पर आसपास खड़े लोग स्तब्ध रह गये। मियाँखान का गला भर आया। वह हाथ जोड़कर बोला- "शम्भूमहाराज ! आपका विश्वास मैं टूटने नहीं दूँगा। वह महान अल्लाहताला यदि मुझे आपकी सेवा का अवसर दे दें तो मैं अपने कलेजे के टुकड़े काटकर आपके कदमों में रख दूँगा।" धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि पिछले कुछ दिनों से मियाँखान की तबीयत कुछ खराब चल रही है। इसीलिए बीच में कई दिन खिड़की में उनका चेहरा दिखाई नहीं पड़ा। भीतर कुछ खटपट करने की आवाज लोगों को बाहर सुनाई पड़ती थी। कुछ दिनों बाद मियाँखान की नियमित गतिविधियाँ आरम्भ हो गयीं। शम्भुराजा की दृष्टि उस पर रोज पड़ती थी। वह प्रातःकाल और सन्ध्या समय शम्भुराजा की हवेली की ओर देखते हुए बड़े आदर से उन्हें बन्दगी करता था। सम्भाजी 123

दो शम्भुराजा को बहादुरगढ़ आये तीन महीने बीत चुके थे। वहाँ की लौह प्राचीर, अमीर-उमरावों से मिलने-जुलने की मनाही, उनके ऊपर होने वाली जासूसी आदि से युवराज स्वयं को बन्दी जैसा अनुभव करने लगे थे। अन्तर इतना ही था कि उनकी हवेली पर ताले नहीं लगाये जाते थे। युवराज के स्वाभिमानी मन ने अच्छी तरह समझ लिया कि वे बन्दीखाने में कैद हो गये हैं। दुर्गाबाई और राणूबाई भी व्यक्तिगत परिचारकों के अभाव में पूरी तरह ऊब गयीं थीं। बूढ़ा दिलेरखान अभी भी उनसे मीठी-मीठी बातें करता था, मित्रता का नाटक करता था। वर्षों से प्रतिष्ठित मुगलों की रियासत, उनकी अनुशासित सेना, इस मैदानी प्रदेश पर वर्चस्व आदि के कारण शम्भुराजा की अपनी योजना के सफल होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इसलिए वे निरन्तर अस्वस्थ होते जा रहे थे। अभी भी बहादुरगढ़ किले पर मुक्त विचरण की सुविधा शम्भुराजा को नहीं थी। वे मुगल सेना की टुकड़ी के साथ भीमा नदी के तट पर, किले की प्राचीरों पर और कभी-कभी नदी की दुर्गम ढलान पर घूमते रहते थे। वहाँ नदी के किनारे चाँद बीबी द्वारा बनवाया गया एक सुन्दर महल था। उसके दूसरी ओर कुछ यादवकालीन मन्दिर थे। ये मन्दिर सुन्दर काले पत्थरों से बनाये गये थे। उनकी चारों दीवारों और गोल छत पर यक्ष और किन्नरों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। बहादुरगढ़ के इस भाग्यशाली जंगल ने अनेक वर्षों की ऋतुओं को ही नहीं अनेक राजाओं के शासन और संस्कृति को भी देखा और पचाया था। इस किले के पास ही भीमा नदी ने एक वलयांकित मोड़ लिया था। वहाँ से कोस-दो-कोस की दूरी पर नदी की विलक्षण गहराई से एक जलाशय बन गया था। उस जलाशय में इतना पानी था कि गर्मियों में भी लाखों सवारों, सिपाहियों और जानवरों के लिए पानी की कमी न होती। सम्भवतः इसी कारण अनेक राजा इस स्थान के प्रति सम्मोहित हुए। यवन शासकों ने नदी के किनारे दो तीन स्थानों पर हाथियों से चरस द्वारा पानी निकालने के लिए लगभग चालीस फीट ऊँची पउदरें बाँधी थीं। जिस प्रकार किसान अपने कुओं पर बैलों को बाँधते और खोलते हैं उसी तरह चमड़े की भारी चरस खींचने के लिए एक साथ चार-चार हाथियों को बाँधा जाता था। अपने गले में बँधी घंटियों की लय पर हाथी चरस खींचते थे। 124 सम्भाजी

आज शम्भुराजा की सवारी भीमा नदी के किनारे-किनारे चल रही थी। उन्होंने रास्ते में पत्थरों से बनी सतियों की छोटी-छोटी समाधियाँ देखीं और बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया। बहादुरगढ़ ने असंख्य चेतनामय जीवनों के साथ अनेक मृत्यु प्रसंग भी देखे थे। घोड़ा दौड़ाते-दौड़ाते शम्भुराजा ने दमड़ी मस्जिद को पार किया और बाले किले की सीमा के बाहर निकल गये। पूर्व दिशा में कुछ दूरी पर सरस्वती नदी की धारा दिख रही थी। वह यहीं गाँव के परिसर में आकर भीमा नदी में मिलती थी। उसके किनारे पर भी हाथी द्वारा चरस खींचने की एक बड़ी पउदर बनी थी। सरस्वती नदी के किनारे-किनारे किले की तटबन्दी की गयी थी। बीचोंबीच मैदान फैला हुआ था। आज धूप में दौड़ते-दौड़ते शम्भुराजा को अचानक मूर्छा का अनुभव हुआ। हाथी से चरस खींचने वाली पउदर की ढलान पर उन्होंने जामुन का झुरमुट देखा। वहाँ पर तटबन्दी की देख रेख के लिए एक उमराव ने उन्हीं जामुन के पेड़ों के बीच हरे रंग का एक अस्थायी शामियाना खड़ा किया था। शम्भुराजा घोड़े से उतरकर शामियाने में चले गये। वे बहुत थके हुए थे इसलिए वहाँ पर रखे गये एक बिस्तर पर लेट गये। लेटे लेटे उनकी दृष्टि सरस्वती नदी के पार विस्तृत मैदान पर पड़ी। वह हिस्सा 'खंडोबा का थान' नाम से जाना जाता था। शम्भुराजा की दृष्टि उस मैदान में खो गयी। उन्हें वहाँ पर एक विलक्षण मृग मरीचिका दिखाई देने लगी। शम्भुराजा नींद में खो गये। अचानक उनके कानों पर हाथी-घोड़ों की इतनी तेज आवाज आयी मानो आसमान फट गया हो। एक जंगल का राजा शेर मुक्त हो गया था। सारे वातावरण में कोई आसमानी विपत्ति आ गयी थी। देखते-देखते नदी की उस तटबन्दी को जोर का धक्का लगा। तटबन्दी सामने वाले जलाशय में गिरने लगी। तटबन्दी पिघलने लगी। नदी का पानी काला काला और हरा-हरा दिखने लगा। एक प्राणी की दाढ़ी के आकार की अयाल जल की सतह पर दिखने लगी। वह विलक्षण प्राणी किले की प्राचीर पर उपहास करता हुआ हँस रहा था। के तुरन्त बाद शम्भुराजा की आँखों के सामने एक बार फिर 'खंडोबा का थान' धूप में खड़ा हो गया। वहाँ पुनः मृगमरीचिका नाचने लगी। वह सूना-सूना मैदान था। उसके सुदूर कोनों से उठने वाली सतियों की चीखें कानों को बहरा बना रही थीं। फिर बैतालों का एक जुलूस उस मैदान में दिखायी पड़ने लगा। उसमें वाद्य बहुत बड़े थे और बजाने वाले बहुत छोटे, बीमार चिड़ियों जैसे या आवारा कुत्तों जैसे। पता नहीं किसका वह जुलूस है और किसकी पालकी। मैदान काँटों से भरा है, बाजे बजाने वालों के पाँव काँटों को रौंदते हुए खून से लथपथ हैं। ये कहाँ जा रहे हैं। शम्भुराजा आँखें फाड़ फाड़कर उन आकृतियों को पहचानने का प्रयत्न कर रहे सम्भाजी 125

हैं, किन्तु आकृतियाँ धुँधली पड़ती जा रही हैं। मैदान की अदृश्य चीखें असह्य होती जा रही हैं। क्या है यह भयानक सपना? शम्भूराजा का गला सूख रहा था। वे झट से बिस्तर से उठकर बैठ गये। दृष्टि के सामने खंडोबा का सूना सूना थान यथावत था। शम्भूराजा का सारा शरीर पसीने से तर हो गया था। तीन दक्खिन की सूबेदारी का अर्थ है एक बहुत ही कठिन कार्य। दिल्ली के बाद मुगल सत्ता का सही सिंहासन यही सूबेदारी थी। औरंगजेब स्वयं दो बार दक्षिण का सूबेदार रह चुका था। इसलिए यहाँ की सारी बारीकियाँ, यहाँ के टंटे बखेड़े, लाभ हानि आदि से भली भाँति परिचित था। दिलेरखान का अनुमान था कि विद्रोही शिवाजी के पुत्र को बहकाकर बहादुरगढ़ के पिंजरे में बन्द करने के समाचार से प्रसन्न होकर बादशाह औरंगजेब उसे पुरस्कार देगा किन्तु इसके बदले आलमगीर ने अपने शहजादे मुअज्जम को दक्खिन की ओर भेजा। इस समाचार ने दिलेरखान को बेचैन कर दिया था। दिल्ली से एक साँड़नी सवार सन्देश लेकर आ गया। दिलेरखान को लगा जैसे जिससे भोजन मिलने की अपेक्षा थी उसने माथे पर पत्थर मार दिया हो। आँखें फाड़ फाड़कर औरंगजेब के शब्दों को पढ़ते हुए उसका दम घुटने लगा। “दिलेर! हमें खबर मिल रही है कि आप रोज उठते बैठते उस संभाजी के स्वागत में जलूस निकालते हो। नाक से मोती बड़ा नहीं होना चाहिए। दुश्मन का बेटा अपनी फौज में आया है, उसका फायदा उठाओ। अपनी फौज में उसे ढाल बनाकर हमेशा आगे रखो। मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करो। शत्रु को ज्यादा-से ज्यादा नुकसान पहुँचाओ।” इनाम के बदले मिलने वाली कान खोलने वाली इस भाषा ने दिलेरखान को दुखी कर दिया। उसने अपने अनुभवी दीवान से परामर्श किया। उसके दीवान जियाखान ने हँसकर कहा- “अजी हुजूर यह सन्देश लिखते समय बादशाह ने बहुत दिमाग लगाया है।” “मतलब?” 126 :: सम्भाजी

“उसको एक ही पत्थर से दक्खिन में अनेक पक्षियों का शिकार करना है। आलमपनाह की इच्छा है कि आप शिवाजी, बीजापुर और गोलकोंडा पर आक्रमण करो और शिवाजी के बेटे को बगल में लेकर चारों दिशाओं में घूमो।” दिलेरखान ने जियाखान से पूछा-“मौजूदा स्थिति में हम कहाँ जंग लड़ सकते हैं?” “भूपालगढ़।” “भूपालगढ़? कहाँ है यह?” “बीजापुर के रास्ते में, बानूर गाँव के पास। जत के आसपास।” “किसका किला?” “मराठों के ही कब्जे में है। उस किले की तटबन्दी बहुत मजबूत है। उस किले का मराठा किलेदार भी फौलादी सीने वाला है। किन्तु यदि यह किला हाथ में आ जाए तो बीजापुर की नाक में नकेल डालना बहुत आसान हो जाएगा।” दिलेरखान के दिमाग को अनेक पैर निकल आये। उसने तत्काल भूपालगढ़ के सम्बन्ध में छोटी से छोटी जानकारी इकट्ठी करनी आरम्भ कर दी। एक समय चाकण के पास के किले में पचावन दिन तक निरन्तर लड़ते हुए बहादुर फिरंगोजी नरसाल। न शाडस्ताखान की नींद हराम कर दी थी। वही फिरंगोजी इस समय भूपालगढ़ का किलेदार था। विट्ठल भालेराव उसका कुशल सचिव था। दिलेरखान को सूचना मिल रही थी कि किले में बड़ी मात्रा में बारूद और अनाज रखा गया था। किले पर बाणोबा अर्थात् महादेव का जागृत मन्दिर था। वहाँ के निवासियों का फिरंगोजी और महादेव पर अटूट विश्वास था। बहादुरगढ़ में भूपालगढ़ पर आक्रमण की योजनायें बड़ी तेजी से निश्चित हो रही थीं। एक दिन सुबह सुबह बहादुरगढ़ के किले से घुड़सवारों की फौज बाहर जाने लगी। तोपों की गाड़ी के पहिये भी आवाज करते हुए चलने लगे। फौज के माथ जाने वाला बाजार तो भोर से सक्रिय हो गया था। वणिक, पानी ढोने वाले भिश्ती आदि सभी अपने घोड़ों और खच्चरों के साथ बाहर निकल रहे थे। शम्भूराजा अपनी हवेली में चिन्ताग्रस्त बैठे थे। एक तो दिलेरखान ने इस लड़ाई के सम्बन्ध में उन्हें स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया था। दूसरे दो दिन पूर्व ही शृंगारपुर से कवि कलश और रायगढ़ से रानी येसूबाई के गोपनीय पत्र एक साथ उन्हें मिले थे। दोनों पत्रों में एक ही तरह के समाचार थे। “युवराज अब वहाँ खाली मत बैठिये। कुछ कीजिये। जब से आप यवनों से जाकर मिले हैं तब से यहाँ पर आपके विरोधियों ने आपकी बदनामी के कारखाने खोल लिये हैं। कुछ लोगों ने तो ऐसी अफवाह फैलायी है कि नेताजी पालकर की तरह शीघ्र ही इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाले हैं। अपनी इच्छा पूरी करने में यदि भाग्य साथ नहीं दे रहा है, आपको अपनी वीरता दिखाने का अवसर नहीं मिल रहा है तो जो है कम से कम सम्भाजी :. 127

उसकी रक्षा का तो प्रयास करो।" इन गोपनीय पत्रों से शम्भूराजा की स्थिति और भी नाजुक हो गयी थी। फौज के बाहर निकलने के लिए नगाड़े बज रहे थे। समय बहुत कम था। इसलिए फौलादी टोप लगाये, फौजी के वेश में दिलेरखान स्वयं युवराज के महल में आया। शम्भूराजा की बन्दगी करके दिलेरखान ने कहा, "शहजादे! चलो तैयार हो जाओ। दो दिन में हमें भूपालगढ़ पहुँचना है।" "वहाँ जाने की मेरी इच्छा नहीं है।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में नकार दिया। "लेकिन बादशाह आलमगीर का ऐसा स्पष्ट आदेश है।" "ऐसा क्या? कौन सा प्रदेश जीतना है और कौन सा नहीं, इसके लिए सीधे दिल्ली से आदेश आने लगे, फिर तो हो गया।" दिलेरखान के मन पर बादशाह के आदेश की स्पष्ट छाप थी। "मराठों का शाहजादा 'संभा' एक बहुत कीमती हीरा है। होशियारी से उससे ऐसा काम करा लो कि शिवाजी की बदनामी हो और हम यवनों का फायदा ही-फायदा।" अपनी इच्छा के विरुद्ध शम्भूराजा को भूपालगढ़ की ओर कूच करना ही पड़ा। दो तीन दिनों में ही फौज ने भीमा का प्रदेश पार कर लिया। बारामती फलटण, माणदेश होते हुए भूपालगढ़ के समीप पहुँच गयी। दिलेरखान बड़ी सावधानी से कदम बढ़ा रहा था। चाकण के किले को बहुत थोड़ी सी फौज से जीतने वाला, औरंगजेब के मामा शाइस्ताखान के दाँत खट्टे करने वाला फिरंगोजी नरसाड़ा भूपालगढ़ का किलेदार था। दिलेरखान जानता था कि फिरंगोजी आसानी से हथियार डाल देने वाला नहीं है, वह बहादुरी से लड़ेगा। इसलिए आधीरात के समय उसने अपने फौजियों को जगह-जगह तैनात कर दिया। रात में उसने संभाजी से कहा- "कहो अपने जात भाइयों से। उनसे कहो कि लड़ाई की बात भूलकर किला छोड़कर निकल जाओ।" दिलेरखान की धूर्तता शम्भूराजा की समझ में आ रही थी। किन्तु कंटिया में फँसी मछली की तरह छूट भी नहीं पा रहे थे। जीवित रहने के लिए तड़पना मजबूरी थी। उन्होंने अपने विश्वसनीय दूत से किले पर खत भेजा था- "किला कमजोर है और दिलेरखान की फौज बहुत बलशाली है। लड़ाई लड़ने से कोई फायदा नहीं है। पिताजी की सेना की व्यर्थ तबाही मत करो। चुपचाप किला हमारे हवाले करके निकल जाओ।" 128 :: सम्भाजी