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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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है। वैसी ही खुशी दिलेरखान को हो रही थी। वह सोच नहीं पा रहा था कि शम्भुराजा को कहाँ रखे और कैसे रखे ? दोपहरी के एकान्त में दोनों की बातें चल रही थीं। यहाँ तक आये हुए मराठों के स्वाभिमानी युवराज को अपनी किसी मूर्खता से नाराज न करके, प्यार का गलीचा फैलाकर अपने क्षेत्र में ले जाने के लिए बहुत सावधानी से कार्य कर रहा था। वह युवराज को उत्तेजित करते हुए बोला, “युवराज, इसके आगे की आपकी जिन्दगी में आनन्द-ही-आनन्द है। शहजादे, अब किसी बात की फिक्र न करना। आपकी नाराजगी और रायगढ़ के बेढंगेपन की पूरी खबर है आपके इस भाईजान को।” शम्भुराजा चुप थे। दिलेरखान ने विश्वास का हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन शहजादे, ममता से अन्धे होकर अपनी सियासती का मजहब भूलने का पाप मत करो। अपनी हुकूमत सँभालने के लिए माँ बाप यार दोस्त मेहमान आदि को अपने कब्जे में रखना पड़ता है। कल आपकी सौतेली माँ सोयरारानी अपने बेटे के लिए ही राज्य माँगने वाली है। उनकी इच्छा के सामने आपके अब्बाजान शिवाजी शरणार्थी बन जाएँगे। अपने पुराणों को पढ़ो, इतिहास को पढ़ो। रावण ने अपने भाई जान के साथ जंग किया, कुश, लव ने राम के साथ, धर्मराज ने अपने मामा शकुनी के साथ—इतना ही नहीं खुद औरंगजेब ने भी अपने बूढ़े बाप के साथ जंग किया था। जंग किये बिना फतेह नहीं फतेह के बिना कीर्ति नहीं।” दिलेरखान को अभी बहुत भाग दौड़ करनी थी। शम्भुराजा को मालूम हुआ कि कुरकुम्भ में उनका जो स्वागत हुआ था उससे कहीं अधिक भव्य और शानदार स्वागत की तैयारी बहादुरगढ़ पर आरम्भ हो गयी थी। बहादुरगढ़ का नाम सुनते ही संभाजी राजा का गला सूख गया। उनके तनाव भरे चेहरे के पीछे क्या कारण था ? यह दिलेरखान की समझ में भी नहीं आ रहा था। मुगलों की फौज आगे बढ़ रही थी। सह्याद्रि की श्रेणियों की कतारें पीछे छूट गयीं। भीमा नदी के किनारे का हरा भरा प्रदेश दिखाई दे रहा था। दक्खिन प्रदेश की जिम्मेदारी औरंगजेब ने इससे पहले अपने दूधभाई बहादुरखान कोकलताश जाफरजंग पर सौंपी थी। उसी ने भीमा नदी के किनारे पेड़गाँव के पास एक बहुत बड़ा किला बनवाया था। बहादुरखान कोकलताश ने अपने ही नाम पर किले का नाम बहादुरगढ़ रखा था। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद रायगढ़ के महल में पहली बार बहादुरगढ़ का नाम संभाजी ने सुना था। इस किले पर उत्तम नस्ल वाले एक सौ कीमती अरबी घोड़ों के साथ एक करोड़ रुपये की राशि पहुँचा दी गयी है। यह समाचार सुनकर शिवाजी महाराज सावधान हो गये थे। एक दिन अचानक लिंपण गाँव की पश्चिम दिशा से दो हजार मराठा सैनिकों के बहादुरगढ़ की ओर लुके-छिपे आने की खबर पाकर बहादुर कोकलताश बहुत 114 :: सम्भाजी