छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे-जैसे अपना प्रदेश पीछे छूटने लगा वैसे-वैसे शम्भूराजा के मन में घबराहट होने लगी। जलती हुई आग से बचने के लिए जब कोई आदमी बाहर निकलता है तो भी अंगारों के कण चटककर उसे क्रूरतापूर्वक जलाते हैं। ऐसी ही मानसिक अवस्था शम्भूराजा की हो रही थी। उनके इस कृत्य में बहादुरी से अधिक धोखा था। वाठार गाँव के पास दिलेरखान का सूबेदार एखलासखान और उसका भतीजा गैरत तीन हजार की सेना लेकर खड़े युवराज की राह देख रहे थे। उन दोनों ने युवराज का स्वागत किया। दिलेरखान द्वारा दी गयी हिदायतों के अनुकूल सब कुछ हो रहा था। सालपा घाट पीछे छूट गया। नीरा नदी भी पीछे गयी। कुरकुंभ गाँव के पास सजाये गये शामियाने के पास दिलेरखान पागल की भाँति इधर-उधर घूम रहा था। उसने जान बूझकर युवराज के स्वागत के लिए एखलास को आगे भेजा था। उसका मराठा जाति पर बिलकुल विश्वास नहीं था। उसे शंका थी कि कहीं शिवाजी और संभाजी बाप बेटे ने कोई षड्यन्त्र न रचा हो? इसी आशंका से उसका मन सम्भ्रमित हो रहा था। दिलेरखान बीच बीच में गद्गद होकर हँसता भी था। क्योंकि एक घंटा पहले दो घुड़सवार यह खुशखबरी लेकर शामियाने में पहुँचे थे 'कि शिवाजी का बेटा अपनी सेना में आ गया है।' उन दूतों के इस सन्देश पर दिलेरखान को क्षणभर के लिए विश्वास ही नहीं हुआ। पुरन्दर के जानलेवा घेरे में जब दिलेरखान ने मुरारबाजी देशपांडे की गर्दन काटी थी और खून से लथपथ हाथों को अपने किनखाफी कुर्ते से पोंछा था तब भी उस आसुरी आनन्द में आज जितनी खुशी नहीं मिली थी। अचानक दिलेरखान की दृष्टि दो-तीन कोस के मैदान की ओर गयी। आसमान में धूल के बादल उड़ाते हुए पागल घोड़े मस्ती से दौड़ रहे थे। कुछ समय में ही सेना दिलेरखान की दृष्टि सीमा में आ गयी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने अपनी आँखों से आनन्द के आँसू पोंछे। सामने देखता है तो सिर से पाँव तक सजाये गये हाथी हौदे में एखलासखान के साथ संभाजी राजा रोब से बैठे थे। शिवाजी महाराज और संभाजी की मुखाकृति में पर्याप्त समानता थी। दिलेरखान उस हौदे को टकटकी लगाए पागल की तरह देखता रहा। परिचारकों का दल आगे दौड़ा। उन्होंने हाथी से उतरने के लिए सीढ़ी खड़ी की। किन्तु दिलेरखान, स्वयं ही, सीढ़ियों से चढ़कर तेजी से ऊपर गया। "आइए दक्खिन की शान! शेर संभाजी महाराज आइए।" ऐसा कहते हुए उसने वहीं पर संभाजी को बाँहों में भर लिया। हज की यात्रा में जैसे छूटा हुआ कोई छोटा भाई दस-बीस वर्ष बाद वापस आ गया हो। उसके आने की जैसी खुशी होती सम्भाजी :: 113