छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंगयी और वे अपना चेहरा टेढ़ा करके अपनी जगह पर बैठ गये। तब दिलेरखान ने स्वयं वस्त्र, उपहार और राजा की पदवी देकर युवराज को सम्मानित किया। समारोह की समाप्ति पर दिलेरखान के साथ अन्य बहुत से लोगों ने युवराज से हाथी पर बैठने का आग्रह किया। किन्तु संभाजी राजा ने यह आग्रह स्वीकार नहीं किया वे अपने हवेली तक पैदल चलकर आये। दिलेरखान ने किले के अन्दर ही युवराज के ठहरने की व्यवस्था की थी। महादजी नाइक का निवास भी बगल के महल में था। अपने बहनोई का हाल-चाल जानने के लिए युवराज स्वयं जाकर उनके सामने खड़े हो गये। सामने बिछौने पर बैठे महादजी अपनी जगह से जग भी नहीं हिले। उन्होंने शम्भुराजा का तनिक भी सम्मान नहीं किया। अन्ततः युवराज ही उनसे बोले, "दाजी, कैसी है आपकी तबीयत?" "ठीक है।" महादजी ने क्रुद्ध स्वर में कहा। "झूठी मोच का बहाना करने से दर्द होगा भी कैसे?" महादजी ने क्रोध से संभाजी राजा की ओर देखा। बगल में थूकते हुए उन्होंने उल्टा प्रश्न किया— "शिवाजी महाराज को छोड़कर तू यहाँ क्यों आया संभा? क्या जरूरत थी यहाँ आने की?" "अपने बहनोई की तरह दूसरे का गुलाम बनने के लिए सोचकर।" "बिला वजह जले पर नमक न छिड़को संभा। मेरे जैसे मराठों की कितनी पीढ़ियाँ दूसरों की गुलाम बनती आयी हैं। किन्तु तुम बाप बेटों ने हिन्दवी स्वराज्य का जो संकल्प लिया है, वह तो पूरा करो।" महादजी के कठोर शब्दों ने युवराज के कलेजे के टुकड़े टुकड़े कर दिये। उनके चेहरे पर से दरबार की कान्ति गायब हो गयी। वैभव से परिपूर्ण उस नगरी में शम्भुराजा असीम उदासी और अकेलेपन का अनुभव करने लगे। दो दिन में ही रहिमतपुर से लम्बी यात्रा करके शाही पालकियाँ बहादुरगढ़ पर आ पहुँचीं। सज्जनगढ़ से निकलते समय युवराज को आशंका थी कि मुगलों के राज्य की ओर जाने में सम्भवतः उनका पीछा किया जाएगा। यह भी सम्भव था कि तलवारें निकलतीं और लड़ाई होती। इसीलिए शम्भुराजा ने दुर्गाबाई को अपने साथ नहीं लिया था। उन्हें समीप के मुगल थाने पर अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ भेज दिया था। वहाँ के थानेदार ने ही उन्हें सकुशल बहादुरगढ़ पहुँचाया था। किन्तु दुर्गाबाई के साथ राणूबाई को देखकर शम्भुराजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने चिन्तित होकर पूछा— "यह क्या कर बैठी दीदी? वाई में घर गृहस्थी, बाल-बच्चे, घर-बार, नाते-रिश्ते छोड़कर यहाँ किसलिए आ गयी?" "जाने दो शम्भू! तुम्हें कभी माँ की स्नेह छाया तो मिली नहीं। जीजा माता भी नहीं रहीं। पिताजी ने भी तुम्हारी ओर से मुख मोड़ लिया। तुम्हें माया-ममता देने वाला घर का कोई व्यक्ति तुम्हारे साथ होना चाहिए न?" 118 :: सम्भाजी