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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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अभी भूल नहीं पाया था। शिवाजी महाराज जब कर्नाटक की बड़ी लड़ाई के लिए निकल रहे थे तो अपनी अनुपस्थिति में उन्हें आशंका थी कि अनुपस्थिति का लाभ उठाकर दक्षिण में नियुक्त मुगल सूबेदार बहादुरखान जाफरजंग आक्रमण कर सकता था। इसीलिए उन्होंने खान के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था। उन्होंने कहा था, “हिन्दवी स्वराज के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण किले बादशाह औरंगजेब को बिना शर्त भेंट करके स्वयं शरणार्थी बन जाएँगे क्योंकि इस उम्र में केवल शान्ति चाहिए।” इस प्रकार का प्रस्ताव लेकर मराठा दूत जब-जब बहादुरखान के पास पहुँचे तो उन्हें बिना सोंठ खाये ही खाँसी चले जाने जैसा समाधान मिला। काबुल, कंधार, अफगानिस्तान के साथ नित्य झगड़े से संत्रस्त औरंगजेब के मन को यह प्रस्ताव बहुत बड़ी विजय जैसा सुखद लगा। प्रसन्नतापूर्ण वातावरण में सारी बातें निश्चित हो गयीं। इस सन्धिपत्र को व्यावहारिक रूप देने के लिए शिवाजी महाराज ने केवल एक शर्त रखी थी। उन्हें सन्धिपत्र पर बादशाह औरंगजेब के हाथ के पंजे का निशान चाहिए था। बहादुर खान ने हँसते-हँसते इस शर्त को स्वीकार कर लिया। पंजे का निशान लेने के लिए कागज दिल्ली रवाना किया गया। कागज लौटने पर ही सब कुछ निश्चित होना था। उस आनन्द की बेहोशी में खान शिवाजी महाराज को उपहार के रूप में देने के लिए एक उत्तम हाथी और एक चन्दन की पालकी तैयार रखी थी। सन्धि की शर्तों और पंजे के निशान आदि एकत्र करने में कुछ महीने बीत गये। इसी बीच शिवाजी महाराज ने कर्नाटक की लड़ाई जीत ली। वहाँ से वापस आने पर खान के दूत जब सन्धिपत्र लेकर शिवाजी महाराज के पास पहुँचे तो शिवाजी महाराज ने सन्धिपत्र को फेंक दिया। बहादुर खान एकबार पुनः धोखा खा गया। औरंगजेब उस पर इतना क्रुद्ध हुआ कि दक्षिण की सूबेदारी उसे खोनी पड़ी। समारोह के बीच ही दिलेरखान ने बगल की ओर उँगली से इशारा किया। उसी ओर एक ऊँचा सजा-सजाया हाथी झूम रहा था। उसी की ओर संकेत करते हुए दिलेरखान ने कहा, “शहजादे, डेढ़-दो वर्ष पहले मराठों को भेंट करने के लिए बहादुर खान साहब ने यही हाथी तैयार कर रखा था। वही हाथी आज हम आप को भेंट करते हैं।” विशिष्ट लोगों की ओर हाथ उठाकर दिलेरखान ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, “शम्भूराजा के लिए हमने शाही लिबास सोने और हीरे जवाहरात के गहने मँगवाये हैं। हम चाहते हैं कि यह सारा उपहार हमारी ओर से युवराज के बहनोई महादजी नाइक निम्बालकर उन्हें भेंट करें।” अगल-बगल खचाखच भरी भीड़ ने जोर से तालियाँ बजाकर दिलेरखान के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कुछ असन्तुष्ट और नाखुश चेहरा बनाकर महादजी नाइक उठकर खड़े हो गये। किन्तु उठते-उठते उनकी पीठ में जोर की मोच आ सम्भाजी :: 117