भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

युवराज का मुँह सूख गया। चमड़े की थैली को मुँह से लगाकर जल्दी जल्दी पानी पीने लगे। किन्तु उनकी प्यास बुझ नहीं रही थी। भीमा नदी के किनारे का वह किला अनुमानतः छः सौ एकड़ जमीन पर फैला हुआ था। भीतरी प्राचीर के अन्दर मुगल नगरी बसी थी। बाहर की प्राचीर पूर्व की ओर लगभग डेढ़ कोस तक फैली थी। उसने भीमा से मिलने वाली छोटी नदी सरस्वती को भी अपने भीतर समेट लिया था। रायगढ़ या राजगढ़ जैसे पहाड़ी किलों में ही युवराज को रहने की आदत थी। जिससे बहादुरगढ़ की आयताकार हवेलियाँ बड़े-बड़े महल ऊँचे ऊँचे मन्दिरों और मस्जिदों की चोटियाँ देखकर शम्भूराजा को बचपन में देखा गया आगरा शहर याद आ रहा था। बहादुरगढ़ पर साठ-सत्तर हजार रैयत और सैनिकों का निवास था। वहाँ पर अरबी, ईरानी, खोजा, मुगल, दक्खिनी मुसलमान मराठा सैनिक, हुकूमत करने वाले उत्तर के मुगल, कुनबी, कारीगर, मिस्त्री पानी भरने वाले विविध जमातों और वर्णों के लोगों की भीड़ जमा थी। किले के बीचोंबीच कुछ ऊँची जगह पर बहादुर खान ने एक चार बरामदे वाला बड़ा महल बनवाया था। उस सागौन और शीशम के महल में दीवारें और पर्दे नहीं थे। इसलिए वहाँ आमसभा में बैठे राज्य कर्मचारियों और प्रजा को भीमा नदी के प्रवाह का दर्शन होता था। दिलेरखान के साथ शम्भूराजा जब उस महल में प्रवेश कर रहे थे तब वहाँ दीवाली जैसी रोशनी की गयी थी। मुहल्लों और गलियों में पटाखे और अनार फूट रहे थे। किनारों पर भव्य दीप ज्योति जल रही थी। जलते दीपों की ज्योति भीमा के शान्त प्रवाह में झिलमिला रही थी। यह सारी रोशनी खिलखिलाकर हँसते हुए बगल के अँधेरे से कह रही थी—“शिवाजी का पुत्र संभाजी मुगलों से मिल.गया।‘’ समारोह में शम्भूराजा की बहादुरी के गीत गाये जा रहे थे। उन्हें महँगे वस्त्र और रत्नमालाएँ अर्पित की जा रही थीं। चारों ओर बैठे दरबारियों और सरदारों पर युवराज की नजर घूम रही थी। इसी बीच शम्भूराजा के ठीक सामने बैठे एक लम्बा पतला उमराव युवगज को टकटकी लगाए देख रहा था। युवराज का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट हुआ। उस आदमी की दाढ़ी मुगलों जैसी थी। बहुत दिनों तक पराये प्रदेश में रहने के कारण उसका पहनावा, ठाट-बाट, सिर की पगड़ी आदि पक्के मुसलमान जैसा था किन्तु वह वास्तव में एक मराठा था। शम्भूराजा ने उससे आँख मिलाई तो उसके चेहरे पर घृणा का भाव आ गया और क्रोध से उसने अपनी आँखें दूसरी ओर घुमा लीं! बहुत दिनों के बाद मिलने वाला वह मराठा उमराव बजाजी नाइक का पुत्र महादजी था। इसी के साथ युवराज की बड़ी बहन सखुबाई का विवाह हुआ था। आज शत्रु के शिविर में शिवपुत्र का बड़ा सम्मान हो रहा था। कि शिवाजी महाराज द्वारा बहादुरगढ़ के गाल पर जड़ी गयी दूसरी जोरदार थप्पड़ को बहादुरगढ़ 116 :: सम्भाजी