छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं, किन्तु आकृतियाँ धुँधली पड़ती जा रही हैं। मैदान की अदृश्य चीखें असह्य होती जा रही हैं। क्या है यह भयानक सपना? शम्भूराजा का गला सूख रहा था। वे झट से बिस्तर से उठकर बैठ गये। दृष्टि के सामने खंडोबा का सूना सूना थान यथावत था। शम्भूराजा का सारा शरीर पसीने से तर हो गया था। तीन दक्खिन की सूबेदारी का अर्थ है एक बहुत ही कठिन कार्य। दिल्ली के बाद मुगल सत्ता का सही सिंहासन यही सूबेदारी थी। औरंगजेब स्वयं दो बार दक्षिण का सूबेदार रह चुका था। इसलिए यहाँ की सारी बारीकियाँ, यहाँ के टंटे बखेड़े, लाभ हानि आदि से भली भाँति परिचित था। दिलेरखान का अनुमान था कि विद्रोही शिवाजी के पुत्र को बहकाकर बहादुरगढ़ के पिंजरे में बन्द करने के समाचार से प्रसन्न होकर बादशाह औरंगजेब उसे पुरस्कार देगा किन्तु इसके बदले आलमगीर ने अपने शहजादे मुअज्जम को दक्खिन की ओर भेजा। इस समाचार ने दिलेरखान को बेचैन कर दिया था। दिल्ली से एक साँड़नी सवार सन्देश लेकर आ गया। दिलेरखान को लगा जैसे जिससे भोजन मिलने की अपेक्षा थी उसने माथे पर पत्थर मार दिया हो। आँखें फाड़ फाड़कर औरंगजेब के शब्दों को पढ़ते हुए उसका दम घुटने लगा। “दिलेर! हमें खबर मिल रही है कि आप रोज उठते बैठते उस संभाजी के स्वागत में जलूस निकालते हो। नाक से मोती बड़ा नहीं होना चाहिए। दुश्मन का बेटा अपनी फौज में आया है, उसका फायदा उठाओ। अपनी फौज में उसे ढाल बनाकर हमेशा आगे रखो। मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करो। शत्रु को ज्यादा-से ज्यादा नुकसान पहुँचाओ।” इनाम के बदले मिलने वाली कान खोलने वाली इस भाषा ने दिलेरखान को दुखी कर दिया। उसने अपने अनुभवी दीवान से परामर्श किया। उसके दीवान जियाखान ने हँसकर कहा- “अजी हुजूर यह सन्देश लिखते समय बादशाह ने बहुत दिमाग लगाया है।” “मतलब?” 126 :: सम्भाजी