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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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आज शम्भुराजा की सवारी भीमा नदी के किनारे-किनारे चल रही थी। उन्होंने रास्ते में पत्थरों से बनी सतियों की छोटी-छोटी समाधियाँ देखीं और बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया। बहादुरगढ़ ने असंख्य चेतनामय जीवनों के साथ अनेक मृत्यु प्रसंग भी देखे थे। घोड़ा दौड़ाते-दौड़ाते शम्भुराजा ने दमड़ी मस्जिद को पार किया और बाले किले की सीमा के बाहर निकल गये। पूर्व दिशा में कुछ दूरी पर सरस्वती नदी की धारा दिख रही थी। वह यहीं गाँव के परिसर में आकर भीमा नदी में मिलती थी। उसके किनारे पर भी हाथी द्वारा चरस खींचने की एक बड़ी पउदर बनी थी। सरस्वती नदी के किनारे-किनारे किले की तटबन्दी की गयी थी। बीचोंबीच मैदान फैला हुआ था। आज धूप में दौड़ते-दौड़ते शम्भुराजा को अचानक मूर्छा का अनुभव हुआ। हाथी से चरस खींचने वाली पउदर की ढलान पर उन्होंने जामुन का झुरमुट देखा। वहाँ पर तटबन्दी की देख रेख के लिए एक उमराव ने उन्हीं जामुन के पेड़ों के बीच हरे रंग का एक अस्थायी शामियाना खड़ा किया था। शम्भुराजा घोड़े से उतरकर शामियाने में चले गये। वे बहुत थके हुए थे इसलिए वहाँ पर रखे गये एक बिस्तर पर लेट गये। लेटे लेटे उनकी दृष्टि सरस्वती नदी के पार विस्तृत मैदान पर पड़ी। वह हिस्सा 'खंडोबा का थान' नाम से जाना जाता था। शम्भुराजा की दृष्टि उस मैदान में खो गयी। उन्हें वहाँ पर एक विलक्षण मृग मरीचिका दिखाई देने लगी। शम्भुराजा नींद में खो गये। अचानक उनके कानों पर हाथी-घोड़ों की इतनी तेज आवाज आयी मानो आसमान फट गया हो। एक जंगल का राजा शेर मुक्त हो गया था। सारे वातावरण में कोई आसमानी विपत्ति आ गयी थी। देखते-देखते नदी की उस तटबन्दी को जोर का धक्का लगा। तटबन्दी सामने वाले जलाशय में गिरने लगी। तटबन्दी पिघलने लगी। नदी का पानी काला काला और हरा-हरा दिखने लगा। एक प्राणी की दाढ़ी के आकार की अयाल जल की सतह पर दिखने लगी। वह विलक्षण प्राणी किले की प्राचीर पर उपहास करता हुआ हँस रहा था। के तुरन्त बाद शम्भुराजा की आँखों के सामने एक बार फिर 'खंडोबा का थान' धूप में खड़ा हो गया। वहाँ पुनः मृगमरीचिका नाचने लगी। वह सूना-सूना मैदान था। उसके सुदूर कोनों से उठने वाली सतियों की चीखें कानों को बहरा बना रही थीं। फिर बैतालों का एक जुलूस उस मैदान में दिखायी पड़ने लगा। उसमें वाद्य बहुत बड़े थे और बजाने वाले बहुत छोटे, बीमार चिड़ियों जैसे या आवारा कुत्तों जैसे। पता नहीं किसका वह जुलूस है और किसकी पालकी। मैदान काँटों से भरा है, बाजे बजाने वालों के पाँव काँटों को रौंदते हुए खून से लथपथ हैं। ये कहाँ जा रहे हैं। शम्भुराजा आँखें फाड़ फाड़कर उन आकृतियों को पहचानने का प्रयत्न कर रहे सम्भाजी 125