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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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दो शम्भुराजा को बहादुरगढ़ आये तीन महीने बीत चुके थे। वहाँ की लौह प्राचीर, अमीर-उमरावों से मिलने-जुलने की मनाही, उनके ऊपर होने वाली जासूसी आदि से युवराज स्वयं को बन्दी जैसा अनुभव करने लगे थे। अन्तर इतना ही था कि उनकी हवेली पर ताले नहीं लगाये जाते थे। युवराज के स्वाभिमानी मन ने अच्छी तरह समझ लिया कि वे बन्दीखाने में कैद हो गये हैं। दुर्गाबाई और राणूबाई भी व्यक्तिगत परिचारकों के अभाव में पूरी तरह ऊब गयीं थीं। बूढ़ा दिलेरखान अभी भी उनसे मीठी-मीठी बातें करता था, मित्रता का नाटक करता था। वर्षों से प्रतिष्ठित मुगलों की रियासत, उनकी अनुशासित सेना, इस मैदानी प्रदेश पर वर्चस्व आदि के कारण शम्भुराजा की अपनी योजना के सफल होने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे थे। इसलिए वे निरन्तर अस्वस्थ होते जा रहे थे। अभी भी बहादुरगढ़ किले पर मुक्त विचरण की सुविधा शम्भुराजा को नहीं थी। वे मुगल सेना की टुकड़ी के साथ भीमा नदी के तट पर, किले की प्राचीरों पर और कभी-कभी नदी की दुर्गम ढलान पर घूमते रहते थे। वहाँ नदी के किनारे चाँद बीबी द्वारा बनवाया गया एक सुन्दर महल था। उसके दूसरी ओर कुछ यादवकालीन मन्दिर थे। ये मन्दिर सुन्दर काले पत्थरों से बनाये गये थे। उनकी चारों दीवारों और गोल छत पर यक्ष और किन्नरों के अनेक चित्र उकेरे गये थे। बहादुरगढ़ के इस भाग्यशाली जंगल ने अनेक वर्षों की ऋतुओं को ही नहीं अनेक राजाओं के शासन और संस्कृति को भी देखा और पचाया था। इस किले के पास ही भीमा नदी ने एक वलयांकित मोड़ लिया था। वहाँ से कोस-दो-कोस की दूरी पर नदी की विलक्षण गहराई से एक जलाशय बन गया था। उस जलाशय में इतना पानी था कि गर्मियों में भी लाखों सवारों, सिपाहियों और जानवरों के लिए पानी की कमी न होती। सम्भवतः इसी कारण अनेक राजा इस स्थान के प्रति सम्मोहित हुए। यवन शासकों ने नदी के किनारे दो तीन स्थानों पर हाथियों से चरस द्वारा पानी निकालने के लिए लगभग चालीस फीट ऊँची पउदरें बाँधी थीं। जिस प्रकार किसान अपने कुओं पर बैलों को बाँधते और खोलते हैं उसी तरह चमड़े की भारी चरस खींचने के लिए एक साथ चार-चार हाथियों को बाँधा जाता था। अपने गले में बँधी घंटियों की लय पर हाथी चरस खींचते थे। 124 सम्भाजी