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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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रहस्यमय घर का दरवाजा लोहे की रिंच से ढीला किया जा रहा था और अब शम्भुराजा का विश्वस्त खानसामा जैमुद्दीन उस राजबन्दी की जगह पर खिड़की- दरवाजे बन्द करके बड़े मजे से अन्दर बैठा था। आधी रात बीत गयी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। इसी समय हवेली के तहखाने में छुपा हुआ मियाँखान शम्भुराजा के सामने आया। उसने दौड़कर शम्भुराजा के पैर पकड़ लिए। वह विह्वल होकर बोला, "बेटे, मेरी पुकार सुनकर आप के रूप में अल्लाह ही आ गया। " "इसमें इतनी क्या बात है मियाँखान? अब तो मैं भी एक बेटी का पिता बन गया हूँ। इसलिए बेटी के बाप की पीड़ा...।" "शम्भू महाराज आपके इस उपकार को जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा।" शम्भुराजा ने अपने सेवक को पहले से ही बुला रखा था। उसने कुछ ही क्षणों में मियाँखान के चेहरे का भार उतार दिया। बूढ़े सिंह की तरह दिखने वाले मियाँखान लल्लू जैसे विदूषक जैसा दिखने लगा। मियाँखान शम्भुराजा के सिपाहियों के साथ सीमा के बाहर जाने वाला था। "खान साहब! वापस कब आओगे?" "पाँचवीं रात खत्म होने से पहले ही अपने कैदखाने में वापस आ जाऊँगा।" शम्भुराजा कुछ बोलने को तत्पर हुए। एक लम्बी साँस छोड़ करके बोले, "मियाँखान ! बेटी के अभागे बाप के आँसू - उन आँसुओं का विश्वास करके ही हम यह जोखिम उठा रहे हैं। इसमें यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई तो एक राजबन्दी बिना किसी अधिकार के मुक्त कराने का इल्जाम मुझ पर लगाया जाएगा।" शम्भुराजा के ऐसा कहने पर आसपास खड़े लोग स्तब्ध रह गये। मियाँखान का गला भर आया। वह हाथ जोड़कर बोला- "शम्भूमहाराज ! आपका विश्वास मैं टूटने नहीं दूँगा। वह महान अल्लाहताला यदि मुझे आपकी सेवा का अवसर दे दें तो मैं अपने कलेजे के टुकड़े काटकर आपके कदमों में रख दूँगा।" धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि पिछले कुछ दिनों से मियाँखान की तबीयत कुछ खराब चल रही है। इसीलिए बीच में कई दिन खिड़की में उनका चेहरा दिखाई नहीं पड़ा। भीतर कुछ खटपट करने की आवाज लोगों को बाहर सुनाई पड़ती थी। कुछ दिनों बाद मियाँखान की नियमित गतिविधियाँ आरम्भ हो गयीं। शम्भुराजा की दृष्टि उस पर रोज पड़ती थी। वह प्रातःकाल और सन्ध्या समय शम्भुराजा की हवेली की ओर देखते हुए बड़े आदर से उन्हें बन्दगी करता था। सम्भाजी 123