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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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शम्भूराजा ने पानी में ही घोड़े को घुमाया। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि खेलोजी के पीछे तीस चालीस मराठे पानी में उतर चुके थे। वे शम्भूराजा की ओर ही बढ़ रहे थे ! उन्हें युवराज को इस अविचारपूर्ण कार्य से पीछे लौटाना था। युवराज को भय लगा कि ये मराठे उन पर बरसेंगे और उन्हें आगे जाने से रोकेंगे। इसलिए वे म्यान से तलवार खींचकर सावधान हो गये। खेलोजी ने जान की बाजी लगाकर अपने घोड़े को आगे दौड़ाया। युवराज के समीप जाकर ये बूढ़ी हड्डियाँ आँखों में आँसू भरकर बोलीं, "नहीं युवराज ! ऐसी बात मुँह से न निकालो। आपके इस कृत्य से शिवाजी महाराज का कलेजा चूर चूर हो जाएगा।" शम्भूराजा ने घोड़े पर से कृष्णा का पानी हाथ में लिया और गरजती आवाज में बोले, "खेलो बाबा, कृष्णमाता की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, उचित समय आने पर आपको मालूम हो जाएगा कि संभाजी कौन है ? और कैसा है ? सह्याद्रि के साथ सारी दुनिया को जीतकर आपके पास प्रणाम करने के लिए आऊँगा।" यकायक कृष्णा नदी में भाग-दौड़ का खेल शुरू हो गया। 'रुकिए रुकिए' कहते हुए मगठे युवराज के पीछे दौड़ पड़े। युवराज का घोड़ा आगे न बढ़े इसलिए घेरा बनाकर पानी में गोल गोल घूमने लगे। यह देखकर कि मराठे युवराज को रोक रहे हैं, मुग़ल सैनिक पानी में कूद पड़े। मराठों के प्रयत्न का वे विरोध करने लगे। खेलोजी बहुत हठी स्वभाव के थे। शम्भूराजा ने देखा कि खेलोजी का घोड़ा उनके घोड़े की पूँछ से भिड़ रहा है। युवराज हड़बड़ा गये। तलवार से खेलोजी का सामना करना आसान था। किन्तु यदि खेलोजी ने 'शम्भू बच्चे शम्भू बच्चे' कहते हुए युवराज को गले से लगा लिया होता तो उनकी ममता के आगे युवराज की तलवार नीचे गिर जाती। उस क्षण को टालने के लिए शम्भूराजा ने सीधे किनारे की ओर अपना घोड़ा दौड़ाया। युवराज के सामने एक खड़ी चट्टान थी। यह चट्टान बहुत ऊँची थी। इसके पार जाने के लिए घोड़े को दाहिनी या बाईं ओर तिरछे होकर ले जाने की आवश्यकता थी। किन्तु उम भागा दौड़ी को टालने की धुन में युवराज ने अपना घोड़ा सीधे सामने की ओर दौड़ाया। किन्तु खड़ी चट्टान का अनुमान लगाकर घोड़ा अपनी जगह पर नाचने और हिनहिनाने लगा। युवराज ने क्रुद्ध होकर जोर से लगाम खींची और एड़ लगाई घोड़े की नाक से खून की धारा बहने लगी। किन्तु अपनी पीठ पर बैठे मालिक की जरूरत घोड़े की समझ में आयी। वह सचेत हो गया और खड़ी चट्टान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। घोड़ा भी समझ गया था कि इस खड़ी चट्टान को पार करना उसके बूते का नहीं था, फिर भी वह यह पागल प्रयत्न कर रहा था। वह बहुत प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने लगा और इस प्रयत्न में ही नीचे गिर गया। घोड़े के साथ ही युवराज की भी मृत्यु का क्षण आ गया था, किन्तु उन्होंने घोड़े के गिरने के पहले ही छलाँग लगाकर अपने को बचा लिया। सम्भाजी 111