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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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धीरे-धीरे हर बात शम्भूराजा की समझ में आने लगी। मराठी राज्य का युवराज होने के नाते शम्भूराजा को किले में घूमने की चाहे जितनी छूट रही हो, किन्तु उनके महल के आसपास रात-बिरात धीमे-पाँव से गश्त लगाने वाली टोलियाँ घूमती रहती थीं। युवराज पर हमेशा निगरानी रखी जाती थी। यदि वे कभी भीमा नदी की विशाल धारा के किनारे घूमने जाते तो वहाँ भी उन पर निगाह रखी जाती। एक दिन शम्भूराजा ने इन स्थितियों से ऊबकर दिलेरखान से क्रोध के आवेश में प्रश्न किया- "खान साहब हम आपके मेहमान हैं या कैदी?" दिलेरखान का उनके बारे में क्या विचार है? यह शम्भूराजा की समझ में नहीं आ रहा था। इससे वे बहुत बेचैन हो रहे थे। युवराज के रूप में इतना बड़ा मोहरा हाथ लग जाने की खबर दिलेरखान ने तत्काल दिल्ली भेज दी थी। किन्तु औरंगजेब सहज ही उस पर विश्वास करने वाला नहीं था। उसने अपने विश्वस्त लोगों द्वारा इसकी जाँच कराने का निश्चय किया। उसके लिए यह पता लगाना जरूरी था कि जो युवक शिवाजी का बेटा बनकर मुगल फौज में आया था वह सचमुच शिवाजी का पुत्र था या कोई बनावटी युवराज था। दिल्ली दरबार युवराज के विषय में क्या निर्णय करेगा? यह दिलेरखान के लिए स्पष्ट नहीं था इसलिए दिलेरखान के मन की बात शम्भूराजा को भी स्पष्ट नहीं हो रही थी। शम्भूराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्हें न दिन को चैन था न रात को नींद। एक रात को उन्होंने पिछवाड़े की खिड़की से उस रहस्यमय घर में मोमबत्ती का प्रकाश देखा। खिड़की के पास मियाँखान आकर बैठा था। किसी असह्य दुख से वह व्याकुल हो रहा था। उसकी आँखों से धारासार आँसू बह रहे थे। दुख की तीव्रता के कारण उसकी नाक का अग्रभाग लाल हो गया था। लगता था वह स्वयं पर क्रुद्ध हो रहा है। असहाय होकर खिड़की की सलाखों पर सर पटकता था। दूसरे दिन दुर्गाबाई ने भी वही दृश्य देखा। शम्भूराजा का ध्यान आकर्षित करते हुए वे बोलीं, "पता नहीं किस दुःख से वह बेचारा तड़प रहा है? कल से देख रही हूँ, उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अगली रात में भी शम्भूराजा ने वही दृश्य देखा। मियाँखान ऐसे तड़प रहा था जैसे किसी ने छोटी मछली को तपते तवे पर रख दिया हो। उसे देखकर शम्भूराजा ने दुर्गाबाई से कहा, "आप सवेरे भैरोंबाबा का दर्शन करने पिछवाड़े के दरवाजे से ही जाती हो न?" "हाँ, क्यों?" दुर्गाबाई का प्रश्न। "कल सवेग होने से पहले ही दर्शन करने जाओ और जाते-जाते स्वयं ही उसके दुख का कारण पूछ लो। किन्तु यह बात नौकर चाकरों के हाथ नहीं लगनी चाहिए। इसलिए आप स्वयं...।" सम्भाजी :: 121