छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसकी रक्षा का तो प्रयास करो।" इन गोपनीय पत्रों से शम्भूराजा की स्थिति और भी नाजुक हो गयी थी। फौज के बाहर निकलने के लिए नगाड़े बज रहे थे। समय बहुत कम था। इसलिए फौलादी टोप लगाये, फौजी के वेश में दिलेरखान स्वयं युवराज के महल में आया। शम्भूराजा की बन्दगी करके दिलेरखान ने कहा, "शहजादे! चलो तैयार हो जाओ। दो दिन में हमें भूपालगढ़ पहुँचना है।" "वहाँ जाने की मेरी इच्छा नहीं है।" शम्भूराजा ने स्पष्ट शब्दों में नकार दिया। "लेकिन बादशाह आलमगीर का ऐसा स्पष्ट आदेश है।" "ऐसा क्या? कौन सा प्रदेश जीतना है और कौन सा नहीं, इसके लिए सीधे दिल्ली से आदेश आने लगे, फिर तो हो गया।" दिलेरखान के मन पर बादशाह के आदेश की स्पष्ट छाप थी। "मराठों का शाहजादा 'संभा' एक बहुत कीमती हीरा है। होशियारी से उससे ऐसा काम करा लो कि शिवाजी की बदनामी हो और हम यवनों का फायदा ही-फायदा।" अपनी इच्छा के विरुद्ध शम्भूराजा को भूपालगढ़ की ओर कूच करना ही पड़ा। दो तीन दिनों में ही फौज ने भीमा का प्रदेश पार कर लिया। बारामती फलटण, माणदेश होते हुए भूपालगढ़ के समीप पहुँच गयी। दिलेरखान बड़ी सावधानी से कदम बढ़ा रहा था। चाकण के किले को बहुत थोड़ी सी फौज से जीतने वाला, औरंगजेब के मामा शाइस्ताखान के दाँत खट्टे करने वाला फिरंगोजी नरसाड़ा भूपालगढ़ का किलेदार था। दिलेरखान जानता था कि फिरंगोजी आसानी से हथियार डाल देने वाला नहीं है, वह बहादुरी से लड़ेगा। इसलिए आधीरात के समय उसने अपने फौजियों को जगह-जगह तैनात कर दिया। रात में उसने संभाजी से कहा- "कहो अपने जात भाइयों से। उनसे कहो कि लड़ाई की बात भूलकर किला छोड़कर निकल जाओ।" दिलेरखान की धूर्तता शम्भूराजा की समझ में आ रही थी। किन्तु कंटिया में फँसी मछली की तरह छूट भी नहीं पा रहे थे। जीवित रहने के लिए तड़पना मजबूरी थी। उन्होंने अपने विश्वसनीय दूत से किले पर खत भेजा था- "किला कमजोर है और दिलेरखान की फौज बहुत बलशाली है। लड़ाई लड़ने से कोई फायदा नहीं है। पिताजी की सेना की व्यर्थ तबाही मत करो। चुपचाप किला हमारे हवाले करके निकल जाओ।" 128 :: सम्भाजी