छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन पहुँचकर वह यवनों के हाथ लग गया। "युवराज आप जैसे आये हैं उसी रास्ते से लौट जायें। यदि आप किसी संकट में हैं तो हमें बतायें। आपको बचाने के लिए हम खून की नदियाँ बहा देंगे। तुरन्त बताएँ।" दिलेरखान द्वारा इस पत्र को शम्भूराजा के पास पहुँचाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। दिलेरखान अपनी जगह से ही बुर्ज के ऊपर लड़ रही फौज को देख रहा था। किले की तटबन्दी को ध्वस्त करने के लिए यवनों की तोपें तेजी से बढ़ रही थीं। किन्तु मराठों की सेना भी प्रतिकार के नशे में उन्मत्त आगे बढ़ रही थी। सामने से हो रहे आक्रमण की बिना चिन्ता किये निरन्तर आगे बढ़ रही थी। मराठी सेना ने बुर्ज के ऊपर से पत्थरों, ढेलवासों, तीरों आदि की घनघोर वर्षा आरम्भ कर दी। मराठी द्वारा मुकाबले का ढंग देखकर दिलेरखान चकित ही नहीं हुआ, घबरा भी गया। उसने अपनी अगली पंक्ति की सेना को आदेश दिया—"जैसे भी सम्भव हो भूपालगढ़ की तटबन्दी की ध्वस्त करो। उसके बिना बूढ़ा फिरंगोजी हथियार नहीं डालेगा।" खान के इस आदेश के अनुसार तोपों की नयी टोली छुपते हुए सामने वाले रास्ते पर चढ़ने लगी। किले के ऊपर से तीरों और पत्थरों की वर्षा लगातार हो रही थी। बेलदारी फौज लोहे की बड़ी-बड़ी ढालें लेकर अपनी रक्षा कर रही थी। एक हाथ से अपने को बचाते हुए और दूसरे हाथ से तटबन्दी में छेद करते हुए फौज आगे बढ़ रही थी। छेद में सुरंग बनाकर बारूद भरी जा रही थी। मजदूर शीघ्रता से कार्य समाप्त कर रहे थे। वे सुरंग में आग लगाकर शीघ्रता से दूर भागते थे। धड़-धड़ की तेज आवाज के साथ बारूद जलने लगी। उसके प्रभाव से बुर्ज में भी छिद्र होने लगे। तटबन्दी के कुछ पत्थर भी आड़े-तिरछे गिरे किन्तु तटबन्दी की जिद्दी अभेद्य दीवार वैसे ही सिर उठाए खड़ी रही। दोपहर के बाद संभाजी ने दूसरी ओर से सेना का नेतृत्व अपने हाथ में लिया। उन्होंने तटबन्दी की दीवार पर लम्बी-लम्बी सीढ़ियाँ लगवाईं उन सीढ़ियों से यवन सेना तीव्र गति से किले पर चढ़ने लगी। किन्तु सामने से आने वाले तोप के गोलों से अनेक सैनिक जलकर खाक हो गये। कुछ सैनिक गोलों से जलकर कागज के चिथड़ों जैसे झुलसकर नीचे गिर गये। अनेक सैनिकों को मराठों ने अपने तीरों से घायल कर दिया। अन्त में एक बुर्ज ने मुगलों की सेना को मार्ग दिखाया। फिरंगोजी ने किला बचाने के लिए जान की बाजी लगा दी। किन्तु संभाजी राजा और दिलेरखान के भीषण आक्रमण के सामने मराठों को पराजय स्वीकार करनी पड़ी। किले को हाथ से जाते देखकर बहुत से मराठी सैनिक भाग गये। जो बचे वे बन्दी बना लिए गये। सूर्यास्त हो चला। खून से लथपथ भूपालगढ़ अँधेरे का चादर में अपने जख्मों को छुपाने की कोशिश करने लगा। शम्भूराज और दिलेरखान अपनी छावनी के 130 :: सम्भाजी