छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिलेरखान बेचैन था। औरंगजेब की इच्छानुसार आजकल वह बीजापुर की राजनीति में कुछ अधिक ध्यान देने लगा था। बीजापुर की पहले वाली प्रतिष्ठा समाप्त हो चुकी थी। डूब रही आदिलशाही को जीवन दान देने का प्रयास शिवाजी महाराज कर रहे थे। किन्तु दरबार के कुछ सरदारों को रिश्वत की बड़ी-बड़ी गठरियाँ भेजकर अथवा आश्वासनों की खैरात बाँटकर दिलेरखान अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। बीजापुर के बहुत से सरदार मुगलों के पक्षधर बन रहे थे। सर्जाखान जैसी बड़ी मछली जब दिलेरखान के काँटे में फँस गयी तो सभी को घोर आश्चर्य हुआ। इसी समय एक दिन दिल्ली से दिलेरखान के मित्र का एक अति आवश्यक सन्देश आया। उसमें कहा गया था—‘‘दिलेर इसके बाद संभाजी को राजा बनाने की सिफारिश बादशाह को कभी नहीं भेजना। तुम्हारी उस सिफारिश से औरंगजेब के दिमाग पर सन्देह का भूत सवार हो गया है। दिलेरखान उस मूर्ख संभाजी की इतनी तारीफ क्यों करता है? उन दोनों की मित्रता तो नहीं हो गयी है? दिलेरखान छुपकर कहीं मराठों से मिल तो नहीं गया है? संभाजी और दिलेर दोनों मिलकर भागानगर की नौकरी तो नहीं करने वाले हैं? इसी की अनेक आशंकाओं के भूत आलमगीर को पागल बना रहे हैं। दूसरे ही दिन दिलेरखान प्रसन्न मुद्रा में संभाजी राजा के शामियाने में पहुँचा। दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए बोला, ‘‘शम्भू शहजादे, आप को क्या लगता है कि हम सिर्फ मराठों के प्रदेश पर आक्रमण करते हैं, सिर्फ उनको ही जलाते हैं? चलो तैयारी करो हम बीजापुर पर हमला करेंगे। मैं आपको दिखा दूँगा कि यह दिलेरखान इस्लामी प्रदेश को भी किस प्रकार नष्ट करता है?’’ पाँच एक रात को किसी गुप्तचर के पैरों की आहट शम्भूराजा के डेरे के पास सुनाई पड़ी। रायगढ़ से अनेक वेश बदलता हुआ यह गुप्तचर लाखों के मोल का यह पत्र लेकर शम्भू महाराज के पास आया था। शम्भू महाराज ने काँपते हाथों मे वह लिफाफा पकड़ा। उस पर लगी मुहर को आँख भर देखा। प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्व वंदिता। शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।। 138 :: सम्भाजी