छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशम्भू महाराज ने अपनी डबडबाई आँखों को पोंछा और अपनी भावनाओं के आवेग को दबाते हुए पुनः पत्र पढ़ने का प्रयास करने लगे। क्षत्रिय कुलावतंस महाराज शिवाजी प्रति युवराज शम्भूमहाराज दंडवत प्रणाम। जैसे सूखे काष्ठ में कीड़ा घुसकर उसे चालता है उसी प्रकार आपकी चिन्ता ने हमारे दिमाग को खोखला कर दिया है। "शृंगारपुर के केशव पंडित से जिस समय आप रामायण पढ़ रहे थे, उसका अर्थ समझ रहे थे, उस समय आपने क्या सीखा? दशरथ जैसे अपने पिता के आदेश का पालन करने के लिए, भरे पूरे राज्य को लात मारकर प्रभु रामचन्द्र निकल गये, वनवासी बन गये। और आपने हमारे करोड़ों मुद्राओं के स्वराज्य को ठुकराया है। हमसे रुष्ट होकर शत्रु के खेमे में जाने की भूल की है। लाभ हानि का कोई विचार किये बिना आप रुष्ट होकर शत्रु के प्रदेश में चले गये। आपका यह दुर्भाग्यपूर्ण वियोग हमें निरन्तर जला रहा है। आज कल भूपालगढ़ में होने वाले अत्याचारों की कहानी सुन रहा हूँ। इस घटना से हमारी आँखों में आँसुओं की जगह खून उतर आया है। यहाँ के प्रतिष्ठित ओहदेदार जब विदेशी शासकों की सेवा का गोबर उठाने में स्वयं को धन्य समझ रहे थे, तब जंगल खाई के किसी तानाजी, किसी मुरारबाजी जैसे अनेक परिश्रमी हाथों का साथ लेकर मैंने स्वराज्य का यह मन्दिर खड़ा किया। उन्हीं हाथों को दुश्मनों द्वारा संभाजी राजा की आँखों के सामने काट दिया जाय तो इस दुर्भाग्य की क्या कहें? ठीक है आपके मन का दुःख भी हम जानते हैं। आपके प्रति ईर्ष्या रखने वाली आँखें हमारे राज्य में कम नहीं हैं। किन्तु यदि आपको लगता है कि हम केवल उन्हीं के हाथ का पानी पीते हैं, तो यह झूठ है। आपसे ईर्ष्या करने वाले लोगों की अपेक्षा ईमानदारी से आपके लिए जान निछावर करने वाले लोगों की संख्या हमारे राज्य और हमारी फौज में ज्यादा है। एक सिंहासनासीन राजा और एक उदार पिता होकर मैं इस तथ्य को कैसे झुठला सकता हूँ। जो हो गया सो हो गया। रूठना भूलकर उस नर्क से जल्दी बाहर निकलो। जैसे कृष्ण के चले जाने के बाद गोकुल के बाल-बच्चे, स्त्री पुरुष, पशु-पक्षी, वन बाग, गाय बैल दुःख से पागल हो गये थे, वही दशा यहाँ पर आपसे प्रेम करने वालों की हुई है। इस राजा शिवाजी के साथ महाराष्ट्र के साधु संन्यासी, देवी देवता आपका पन्थ निहार रहे हैं। आओ युवराज! शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ जाओ। भबिष्य का दुःख गोवर्धन आपको उठाना है।" "मगर के मुँह से सुरक्षित वापस निकलना आपके लिए बहुत कठिन होगा, इसे हम जानते हैं। किन्तु चिन्ता न करें। हम सावधान हैं। बीजापुर वालों के साथ आपके सम्बन्ध अच्छे हो गये हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे भी आपकी सहायता के सम्भाजी :: 139