छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिए दौड़े आएँगे। शम्भू बेटे चिन्ता मत करो। दूर मत रहो। पत्र समाप्त करता हूँ।" शिवाजी महाराज ने इन भाव भरे शब्दों से शम्भूमहाराज के हृदय को जीत लिया। जिस प्रकार कोई छोटा बच्चा आरम्भिक अवस्था में अपनी लिखी इबारत माता-पिता को उत्साह के साथ दिखाता है, उसी प्रकार संभाजी शिवाजी महाराज के पत्र को दुर्गाबाई और गणूबाई को दिखा रहे थे। पिता के इस पत्र से मन को कितनी शान्ति मिली थी। अब उन पर एक ही धुन सवार थी कि दिलेरखाँ के व्यूह से किस प्रकार बाहर निकलें? स्वराज्य का हर समाचार किसी न किसी के माध्यम से शम्भुराजा के कानों तक पहुँच जाता था। बीजापुर का आदिलशाही शासन विनाश की देहरी पर पहुँच चुका था। बीजापुर के प्रधान दीवान मसूदखान ने शिवाजी महाराज को पत्र लिखा था— "मुगलों की फौज से हमारे बीजापुर राज्य को बचाइए।" शिवाजी महाराज भी इस अवसर का लाभ उठा रहे थे। इसी निमित्त से दक्षिण में मुगलों के विरुद्ध एक बड़ी साजिश रची जा रही थी। मुगलों के आक्रमण के साथ ही बीजापुर की प्रजा घोर अकाल का संकट झेल रही थी। भोजन और चारे की कमी के कारण आदमी और पशु क्षीण होते जा रहे थे। इसीलिए बीजापुर की प्रजा की सहायता के लिए शिवाजी महाराज ने तत्परता दिखाई। दो हजार बैलों की पीठ पर अनाज की गोनियाँ लादकर उन्होंने प्रजा की ठोस सहायता के लिए बीजापुर भेजा। संभाजी राजा बार-बार अनुभव कर रहे थे कि इस भाग-दौड़ के समय में उन्हें स्वराज्य में होना चाहिए था। किन्तु उन्हें यह चिन्ता सता रही थी कि घड़ियाल के जबड़े से अपने परिवार के काफिले के साथ कैसे निकलें? उसी बीच एक दिन सेनापति हंबीरराव मोहिते का सन्देश आया। उन्होंने कहा था, "युवराज! हमने बहुत बहादुर सैनिकों को आपके पास भेजा है। वे अथणी के आसपास जंगलों में घूम रहे हैं। उनकी सहायता लीजिए और शीघ्रातिशीघ्र स्वराज्य में वापस आ जाइए।" यह सूचना शम्भूमहाराज को बहुत अच्छी लगी। शम्भूमहाराज और दिलेरखान दोनों ही नियति के जटिल फन्दे में फँस गये थे। ऐसा हो रहा था जैसे दो हाथी आपस में लड़े और उनकी सूँड़ एक-दूसरे से उलझ गयी हों और उनकी खम्भे जैसी टाँगें नीचे के कीचड़ में धँस गयी हों। "सभा को तुरन्त गिरफ्तार करो और उसे बाँधकर औरंगाबाद ले जाओ।" मुगलों के वरिष्ठ अधिकारियों का यही कहना था। किन्तु दिलेरखान सोचता था कि यदि ऐसा पारस अपने हाथ से निकल गया तो आगे अपनी कीमत एक तिनके के बराबर भी नहीं रहेगी। इस विचार से दिलेरखान हड़बड़ा गया था।" उसी बीच एक रात को जोत्याजी और कवि कलश जैसे आत्मीय मित्रों का एक गुप्त पत्र मिला। उसमें लिखा था— "शम्भू महाराज! सावधान रहें दिल्ली के 140 :: सम्भाजी