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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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नहीं चाहिए यह अपमानित जिन्दगी! दुश्मन की सलाखों के पीछे तड़पते रहना और सूर्य जैसे पिता को जीवनभर दुखी करना, यह भी कोई जिन्दगी है?'' अपनी आँखों की ज्योति जलाये हुए शम्भूराजा रातभर मन्दिर के सामने बैठे रहे। वहीं पर दुर्गाबाई भी आ गयीं। उन्होंने आँसुओं से भीगा अपना चेहरा शम्भूराज के पैरों पर रख दिया। उनका धीरे-धीरे सिसकना फूटकर क्रन्दन बन गया। "युवराज, हमारी चिन्ता से ही आपके जैसे वीर के पैर यहाँ अटके हैं। हमारे कारण ही आपके पंखों में उड़ान की शक्ति नहीं आ रही है। आपका कलेजा फटता है। लेकिन महाराज हम यहाँ की यातनाभरी जिन्दगी में मर भी गये तो कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है। किन्तु आपकी रक्षा से शिवाजी महाराज का स्वराज्य टिकने वाला है।" शम्भूमहाराज ने आँसू पोंछ लिया। वे कुछ निश्चय करके उठे। दुर्गाबाई के गर्भ में छः सात महीने का बच्चा था। पाँव भारी होने के कारण उनका पूरा शरीर सूजा था। उनका पीला रंग, भारी हो गया शरीर और काजल अँजी आँखें देखकर संभाजी राजा का मन भर आया। अपने भारी शरीर को लेकर दुर्गाबाई आगे बढ़ीं। वे गिर न पड़ें, इसलिए उन्हें सँभालने के लिए शम्भूमहाराज अपने आँसू पोंछते हुए आगे बढ़ आए। उन्होंने दुर्गाबाई के तप्त शरीर को बाँहों में भर लिया। दुर्गाबाई ने कहा, "महाराज हमारी ममता में आप इतना क्यों उलझ रहे हैं?" "दुर्गा कैसी बुरो तकदीर है हमारी? हम शृंगारपुर से बाहर निकले तो येसूबाई के पेट में भी बच्चा था। आज ऐसी ही हालत में तुम्हें शैतानों के हाथ मे छोड़कर हम स्वराज्य में वापस चले जाएँ? क्या तुम यही सलाह मुझे दे रही हो? अपनी ही लताओं पर खिलने वाली कलियों को अपनी आँखों से देखने का सौभाग्य इस अभागे शम्भू को कभी मिलेगा कि नहीं?" भोर होते ही शम्भूमहाराज ने राणूबाई को जगाया। वे पहले से ही जग रही थीं। उन सभी का भाग्य अँधेरे की खाई में था। अपनी बड़ी बहन को समझाते हुए शम्भूमहाराज बोले, "कल परसों जब भी अवसर मिलेगा मैं घोड़े को बाहर निकालूँगा। साथ शृंगारपुर के अश्वदल के दो सौ बहादुर सवार होंगे। पलक झपकते ही हम दोनों को यहाँ से बाहर निकलना है।" "हम दोनों को? मतलब ?" राणूबाई चौंक गयी। "दुर्गा यहाँ खान की छावनी में ही रहेगी।" "शम्भूराजा! ऐसी पाँव भारी अवस्था में उनकी देखभाल कौन करेगा?" णू ने प्रश्न किया। "पागल हो गयी हैं दीदी आप? चार दिन की मेहमानी के लिए जीजाजी ने पको मायके भेजा था। आपको यहाँ छोड़कर हम किस मुँह से वापस स्वराज्य में सम्भाजी : 143