छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाटते, मुसलमानों का भी उसी तरह खात्मा करते हैं।" "आप हो कौन? दिल्ली के बादशाह के सूबेदार या लुटेरे पिंडारियों के मुखिया ? यह अत्याचार तुरन्त बन्द करो ! नहीं तो - ?" "नहीं तो क्या कर लोगे ?" दिलेरखान ने मुस्कराते हुए पूछा। शम्भूराजा के पूरे शरीर को मानो बिच्छू डंक मार गया हो। वे आँखें फाड़े अपने बिस्तर पर बैठे थे। उनकी वह विकल अवस्था देखकर दुर्गाबाई और राणूबाई के होश उड़ गये। कोल्हू में जिस प्रकार गन्ने को निचोड़ा जाता है उसी प्रकार शम्भूमहाराज का मन आक्रान्त हो रहा था। उन्होंने कहा, "दुर्गा, हम अपने ही हाथों से अपना क्या कर बैठे ? यह दिलेरखान अब चुप नहीं बैठेगा। वह इसी तरह हमें पन्हाला तक खींचकर ले जाएगा। वहाँ भी वह भूपालगढ़ जैसा ही नाच करेगा और हमें जन्म जन्मान्तर के लिए बदनाम कर देगा।" दो ही दिनों में शम्भूमहाराज को बहादुरगढ़ से एक गुप्त पत्र मिला। यह जानकर कि यह पत्र मियाँखान का ही लिखा है, शम्भूमहाराज आनन्दित हो उठे। मियाँखान ने राजाजी को लिखा था- "मेरे प्यारे दोस्त शम्भूमहाराज ! सिर्फ आपके एहसान से मेरी दोनों लाड़ली बेटियों के हाथ में सगाई की मेहँदी लगी। आजकल जब भी मैं छोटी उम्र में ही मर गये अपने बेटों की सूरत याद करता हूँ तब महाराज आपकी ही तस्वीर मेरी आँखों के सामने आती है। यह खत इतनी जल्दी भेजने की दो वजहें हैं। एक यह खुशखबरी है कि दिल्ली के शाही फरमान ने मुझे बेगुनाह घोषित कर दिया है। जल्दी ही मेरी रिहाई हो जाएगी। लेकिन उन्हीं कर्मचारियों से यह भी मालूम पड़ा कि आने वाले दो-चार दिनों में आप गिरफ्तार हो जाएँगे। यह बहुत बुरी खबर है। इसी काम के लिए बादशाह के खास शैतान औरंगजेब से पाँच हजार की फौज लेकर कब के निकले चुके हैं। आपको हमेशा के लिए कैद करके हाथ-पैर के नाखून निकालकर चिड़ियाघर के मजबूर शेर की तरह जिन्दगी भर नचाने और शिवाजी जैसे आपके महान पिता का जीना हराम कर देने का औरंगजेब का पक्का इरादा है। याद रखो दिलेरखान सिर्फ औरंगजेब का गुलाम है। वह कभी भी किसी का दोस्त नहीं बन सकता। एक पल की भी देर नहीं कीजिए। शम्भूमहाराज ! भाग जाइए, भाग जाइए।" मियाँखान का पत्र पढ़कर शम्भूमहाराज के सिर के बाल खड़े हो गये उनकी रातें शत्रु बनकर शैतान की तरह परेशान करने लगीं। एक ओर बड़े महाराज की दुखी मनःस्थिति उन्हें परेशान कर रही थी तो दूसरी ओर भूपालगढ़ पर टूट कर गिरे सात सौ हाथ और लँगड़े हो गये पाँव भूत बनकर उनकी आँखों के सामने मशाल की तरह नाचते रहते थे। शिवाजी महाराज के अधिकार से बाहर निकला बहादुरगढ़ का वह हाथी युवराज के सारे शरीर को मसल रहा था। उनके उद्गार निकले—"नहीं 142 :: सम्भाजी