छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया न रहूँ, परन्तु मेरे आशीर्वाद और पुण्य कर्म आपका साथ अवश्य निभाएँगे। दो लगभग तीन वर्ष बाद महाराज अपने ज्येष्ठ पुत्र से मिल रहे थे। जिस प्रकार पानी में लाठी मारने से पानी नहीं फटता ठीक उसी प्रकार आत्मीय माया और ममता भी अटूट होती है। अनुभव और अभ्यास से दोनों का दृढ़ मत बन गया था कि पुत्र को ऐसा असाधारण पिता दूसरा नहीं मिल सकता है और वैसे किसी भाग्यवान पिता को इससे अधिक होनहार पुत्र मिलना असम्भव है। इसलिए इन दोनों की दिनचर्या और उनके वार्तालाप को एक अलग ऊँचाई मिल जाती थी। उनकी समझ में नहीं आता था कितनी बात करें और कितनी न करें? प्रातःकाल ही पिता-पुत्र की पालकियाँ किले पर घूमने के लिए निकलती थीं। वे कभी भवानी मन्दिर में रुकते थे तो कभी राज्य की राजकीय गतिविधियों का निरीक्षण करते थे। शाम के समय तो ठंडी हवा खाने के लिए किसी-न किसी तटबन्दी के ऊपर से पालकियाँ निकलती ही थीं। आज शाम को पालकियाँ तीन दरवाजे के पास आकर रुकीं। पिता-पुत्र उस भव्य दरवाजे के ऊपरी छज्जे पर बैठकर पश्चिम दिशा के प्रदेश को देख रहे थे। उस ओर दूर-दूर तक गजापुर और विशालगढ़ के जंगल फैले थे। जैसे कोई भक्त भगवान की शरण में पूर्ण समर्पित होकर, कीर्तन भजन करने लगता है, आजकल उसी प्रकार शम्भूराजा शिवाजी के भक्त हो गये थे। आपस की गलतफहमियों वाली मोम की दीवारें कब की पिघल चुकी थीं। अपने तरुण और सुयोग्य पुत्र को समझदार पिता अपनी ममता की गरमाहट से कर्तव्यपरायणता की शिक्षा दे रहा था। शिवाजी महाराज ने कहा, "आप और छोटे राजाराम दोनों सगे भाई हैं। भाइयों के बीच आपसी लड़ाई का मराठी तरीका छोड़कर आपस में राजी-खुशी से मिलजुलकर रहो। माँ भवानी आप लोगों का कल्याण करेंगी।" "पिताजी! आपके चरणों के आशीर्वाद के अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। केवल दूधभात खाकर भी मैं आपकी और हिन्दवी स्वराज्य की सेवा करता रहूँगा।" शिवाजी महाराज किसी तीव्र विचार से प्रेरित होकर कहने लगे, "बेटे! सम्भाजी :: 157