छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऊँची आवाज में चिल्लाने लगी, "अरे धोखा हुआ है धोखा। दरवाजा खोलो, दरवाजा खोलो।" गोदू की चीख अँधेरे को चीरती चली गयी। रातभर जागकर पहरा देनेवाले दो-तीन पहरेदार दरवाजे की ड्योढ़ी तक आये। मशाल के लाल प्रकाश में उन्होंने नीचे खड़ी गोदू को देखा। गोदू के शरीर से लिपटी साड़ी फट गयी थी। वह पूरा जोर लगाकर चिल्लाई, विह्वल होकर बोली, "पहरेदार चाचा दरवाजा खोलो न, दरवाजा खोलो। मुझे महाराज से अविलम्ब मिलना है। अभी का अभी।" "किलेदार सुबह सात बजे चाभियों का गुच्छा लेकर आएँगे। दरवाजा तभी खुलेगा। उसके पहले नहीं।" पहरेदार की रूखी आवाज आयी। "मगर तब तक धोखा हो जाएगा। महाराज की जान को खतरा है। दया करो। मुझे अन्दर आने दो।" पहरेदार हँस पड़े। रात-बिरात ऐसे बहुत से पागल और भूत-प्रेत दरवाजे के आसपास घूमते रहते हैं। ऐसा लोग कहते हैं। गोदू पर पागलपन सवार हो गया। वह किसी भी तरह इस भयानक खबर को किले पर पहुँचाना चाहती थी। उसने पहरेदारों से बहुत विनती की, जोर-जोर से चिल्लायी। जब प्रार्थना करके थक गयी तब उसने अनुभव किया कि वहाँ रुककर समय बिताने का कोई उपयोग नहीं था। गोदू वहाँ से धीरे-धीरे हट गयी। करौंदों की झाड़ियों के बीच से वह चितदरवाजे से पश्चिम की ओर भूत की तरह सरकने लगी। माँ की गोद से ही वह हिरकणी की बहादुरी की कथा सुनती आयी। एक बार सन्ध्या समय तोप से दी गयी सूचना के अनुसार किले के दरवाजे बन्द हो गये। परिणाम यह हुआ कि दूध देने के लिए किले के अन्दर आयी हिरकणी अन्दर ही फँस गयी। किले के नीचे ही उसका गाँव था। उसका दूध पीता बच्चा घर में अकेला था। अपने बच्चे को दूध पिलाने के लिए उसकी ममता व्याकुल हो उठी। उसी भावावेश में वह रात के घने अँधेरे में किले की खतरनाक ढलान बहादुरी से उतर कर नीचे आ गयी थी। बच्चे की भूख के कारण एक माँ ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी। यहाँ तो एक बहादुर महायोद्धा की जान को खतरा पैदा हो गया है। ऐसा योद्धा जिससे अस्तित्व से यहाँ के पत्थरों को बंजर जमीन को स्वराज्य की रोली लगाई गयी है। जिस शिवाजी के कारण गाँव-गाँव से, जंगल-जंगल सियार भाग गये थे। गरीब लोगों की बहू- बेटियों की इज्जत बची थी, उसी शिवाजी महाराज, मराठों के पंचप्राण की जान संकट में थी। इसके लिए तो कुछ-न कुछ करना ही चाहिए था। कोढाणा जीतने वाली तानाजी की यशवन्ती गोह की भाँति गोदू की जान तिलमिलाने लगी। वह झाड़ियों से भरे घने जंगल को पार करते हुए ऊपर चढ़ने के सम्भाजी :: 15