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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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लिए किसी गुप्त रास्ते की तलाश कर रही थी। उसे अधिक देर तक खोज नहीं करनी पड़ी। वर्षा के पानी को बाहर निकालने के लिए पुसाटी बुर्ज के पास एक पतली-सी सुराख बनी हुई थी। वह सुराख उस समय खाली थी। गोदू ने बिना एक क्षण गँवाए, बिना कुछ आगा-पीछा सोचे उस सुराख में अपना सिर डाल दिया और अगल-बगल के पत्थरों पर अपनी कुहनी टिकाते सरकने लगी। रायगढ़ किले पर अँधेरा छँट रहा था। भोर से ही रंगपंचमी उत्सव की तैयारी आरम्भ हो चुकी थी। किले के ऊपर के राजमार्ग फूल मालाओं और तोरणों से सजाये गये थे। शिवाजी महाराज के प्रासाद के सामने शहनाई बज रही थी। नये-नये झुल्ल डालकर और मस्तक पर नये-नये आभूषणों को पहनाकर हाथियों को सजाया जा रहा था। साधु, संन्यासी, छोटे बच्चे आदि सभी तरह-तरह के कपड़े पहन कर इधर-उधर घूम रहे थे। कमर में तलवार लटकाए, हाथ में भाला-बर्छी लिये पहरेदार महाराज के दरवाजे पर तत्परता से पहरा दे रहे थे। इसी बीच घबराई हुई गोदू वहाँ दौड़ती हुई आयी। वह पहरेदारों से हाथ पैर जोड़ने लगी, अधीर होकर प्रार्थना करने लगी। पहरेदागों के बार-बार रोकने पर भी वह वहाँ से हटी नहीं। पहरेदार जोर से चिल्लाए, "आखिर क्यों मिलना चाहती है तू महाराज से?" इसी समय दूसरी ओर से घोड़ों की टापों की तेज आवाज सुनाई पड़ी। सर्जा नामक एक ऊँचे और बादल के रंग वाले घोड़े पर एक बहुत सुन्दर राजकुमार बैठा था। उसकी पगड़ी में हरे रंग के रत्नों की झालर लगी थी। उसका रंग हल्का अरुणाभ, प्रशस्त भाल, गरूड़ जैसी नाक, काली गहरी आँखें ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व का निर्माण करते थे जिसे देखकर कोई भी सहज रूप से आकर्षित हो जाता था। उसकी सुन्दर दाढ़ी घनी मूँछें, कन्धे पर लटकने वाली रेशमी अलकें आदि उसकी लोकोत्तर सुन्दरता में चार चाँद लगाती थीं। वह बहादुर योद्धा घोड़ा दौड़ाते हुए वहीं आ पहुँचा। उसके आते ही लोग 'शम्भुराजा, संभाजी राजा' कहकर आपस में फुसफुसाने लगे। शम्भुराजा के पीछे घेरदार परिधान में जोत्याजी केसकर, कवि कलश, जगदेव राव जैसे राजा के कुछ सहयोगी भी घोड़े दौड़ाते वहीं आ गये। उनके साथ ही महार जाति का रायप्पा नाक भी चल रहा था। उसके सिर पर जरीदार टोपी नहीं थी, मराठों को पेचदार पगड़ी भी नहीं थी। उसके बदले सिर पर एक सादा साफा बँधा था और शरीर पर कम्बल से बना, आधे शरीर को ढकने वाला, कंचुकी जैसा वस्त्र था। वह काले रंग का, करारी मूँछों, भेदक आँखों वाला किमान था। किन्तु वह अगना घोड़ा शम्भुराजा और कवि कलश के साथ ही दौड़ा रहा था। रंगपंचमी के दिन वैसे भी युवराज शम्भूमहाराज बहुत प्रसन्न और मनमौजी दिखते थे किन्तु आज उनके चेहरे पर रात्रि जागरण की थकान दिखाई पड़ रही थी। 16 : : सम्भाजी

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